Wednesday, 17 August 2016

हमारे ग्रह (पृथ्वी) को सबसे बड़ा खतरा हमारी इस मानसिकता से है कि कोई और इसे बचा लेगा ।

हमारे ग्रह (पृथ्वी) को सबसे बड़ा खतरा हमारी इस मानसिकता से है कि कोई और इसे बचा लेगा ।
 


लगातार बढ़ते प्रदूषण और मानवीय हस्तक्षेपों ने आज पूरे विश्व के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न कर दिया है। इस संभावित खतरे के लिए हम सम्पूर्ण मानव जाति ज़िम्मेवार हैं। मानव के प्रकृति और प्राकृतिक क्षेत्र में अत्यधिक हस्तक्षेप ने पूरे विश्व का कायाकल्प कर दिया है। पूरा विश्व अपना नैसर्गिक सौंदर्य और संतुलन खोने लगा है। इस विकट परिस्थिति में आज हम मानव और देश के बुद्धिजीवी अपने भविष्य को लेकर चिंतित हो गए हैं और अपने ग्रह (पृथ्वी) को बचाने के प्रयासों में लग गए हैं।

सबसे पहले इस बात की ओर हमें अपना ध्यान इंगित करना पड़ेगा कि आज पूरे विश्व को बचाने और संरक्षण की स्थिति क्यों उत्पन्न हो गयी?

जैसा कि हम जानते हैं कि प्रारम्भिक मानव वनों में रहता था और वनोत्पाद ग्रहण करता था। वह प्रकृति का सम्मान करता था और उसके प्रकोपों से भयभीत भी रहता था। अतः वह ऐसे प्रयासों से डरता था जिससे प्रकृति और प्राकृतिक चीजों को नुकसान पहुंचे। अतः उस समय पर्यावरण अशुद्धियों और प्रदूषण का शिकार नहीं था, लेकिन कालांतर में नयी-नयी बस्तियाँ और नगर बसने लगे। इन सब के कारण वनों को काटा गया। लोगों ने अपने आवश्यकता की पूर्ति के लिए धड़ल्ले से वनों का दोहन किया, आज भी ये क्रम जारी है। मनुष्य को किसी भी कीमत पर विकास चाहिए था, इसका खामियाजा प्रकृति को झेलना पड़ा। मनुष्य ने बांध बनाए, सड़कें बनाई, रेल लाइन बिछाई और बड़े-बड़े आवासीय परिसरों का निर्माण किया। ये सारे विकास प्रकृति की कीमत पर हुआ और आज भी प्रकृति का दोहन जारी है।

प्रकृति के इस अत्यधिक दोहन और हस्तक्षेप ने आज सभी बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों और हमें ये सोचने पर विवश कर दिया है कि यदि हम इसी प्रकार से विनाशलीला रचते गए तो निकट भविष्य में हमारा अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। अतः सभी ने पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देना शुरू कर दिया है।

पर्यावरण संरक्षण के प्रयास में वृक्षारोपण को सर्वाधिक महत्व दिया गया है और पूरे विश्व में लोग इसके प्रति जागरूक हो रहे हैं। हालांकि ऐसे प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन लोगों की मानसिकता के कारण इसे पर्याप्त सफलता नहीं मिल रही है। हमारी सोच ये हो गयी है कि पर्यावरण संरक्षण संबंधी कार्य सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं का है, जिसके कारण हम इसमें न तो सक्रिय भागीदारी दे पाते हैं और न तो हमारी रुचि ही होती है। आज के युवा थोड़े सजग तो हैं पर वे भी सोशल वैबसाइट जैसे फेसबूक और ट्विटर पर अपनी सक्रियता ज्यादा दिखा रहे हैं। विद्यालयों में जरूर थोड़ी जागरूकता फैलाने का प्रयास किया जा रहा है फिर भी उनके प्रयास मरुस्थल में एक बाल्टी पानी डालने के समान है, जिसकी सार्थकता उतनी नहीं रह जाती।

हम अपने दायित्वों का निर्वहन भलीभाँति नहीं कर पा रहे हैं। हम अपनी आवश्यकताओं पर कटौती से ही घबरा जाते हैं। आज एयर कंडीशनर और रेफ्रीजरेटर के इस्तेमाल में धड़ल्ले से वृद्धि हुई है। वाहनों का तो शैलाव उमड़ पड़ा है। ये सभी प्रदूषण को बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। एयर कंडीशनर और रेफ्रीजरेटर से जहां बड़ी मात्रा में क्लोरो-फ़्लोरो कार्बन वातावरण में पहुँच रहा है वहीं वाहनों की बढ़ती संख्या ने कार्बन-डाइ-ऑक्साइड, कार्बन-मोनो-ऑक्साइड और सल्फर डाइ-ऑक्साइड जैसे विषाक्त गैसों को पूरे वायुमंडल में फैलाने का कार्य किया है। इन गैसों से ओज़ोन परत प्रभावित हो रही है लेकिन इसका परिणाम हमें भी भुगतना पड़ रहा है। आज लोग त्वचा संबंधी अनेक बीमारियों से ग्रसित हैं। बढ़ते प्रदूषण ने कैंसर, दमा और बेचैनी जैसी अनेक बीमारियों को जन्म दिया है।

मानवीय प्रयास नाकाफी है जो हमारे ग्रह को बचाने के लिए किए जा रहे हैं। हम मानवों को अपने सीमित मानसिकता से बाहर निकालना होगा और ये सोचना होगा कि यदि हमें अपने ग्रह ( पृथ्वी) को बचाना है तो दूरगामी प्रयास करना है। यहाँ मैं कुछ प्रयासों पर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ :-
(1)     हमें प्लास्टिक और वैसे पदार्थ जो पर्यावरण पर दुष्प्रभाव डालते हैं के प्रयोग को तत्काल से रोकना होगा ताकि आने वाले समय में ये पर्यावरण को और नुकसान नहीं पहुंचाए।
(2)     हमें पेट्रोल और डीजल चालित वाहनों के बजाय सीएनजी, सोलर अथवा बैटरी से चालित वाहनों के प्रयोग पर ध्यान देना होगा। पेट्रोलियम अत्यधिक प्रदूषण फैलाते हैं। अतः उपरोक्त विकल्पों के प्रयोग से प्रदूषण पर नियंत्रण रखा जा सकेगा।
(3)     हमें पर्यावरण सुलभ अर्थात जैव निम्नीकरणीय संसाधनों का प्रयोग करना होगा, ताकि इससे मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित न हो और मिट्टी में विषाक्त पदार्थों की आवाजाही को रोका जा सके।
(4)     हमें वृक्षारोपण को अपने दैनिक कार्यक्रमों तथा उत्सवों का हिस्सा बनाना होगा, ताकि जब भी कोई उत्सव हो हम पेड़ लगाएँ इससे पृथ्वी निकट भविष्य में फिर से हरी भरी हो सकेगी। इसके साथ ही वृक्षों के कटाई पर प्रतिबंध को कड़ाई से लागू करना होगा ताकि लोग पेड़ काटने से भयभीत हो। यदि कोई 1 पेड़ काटता है तो उसे इसके एवज में 10 पेड़ लगाना होगा ऐसा आदेश पारित किया जाना चाहिए।
(5)     जो उद्योग धंधे प्रदूषण फैलाते हों तो उन्हें तत्काल से बंद कर देना चाहिए अथवा उसका कोई विकल्प तलाशना चाहिए ताकि प्रदूषण को कम किया जा सके।
(6)     विकसित और विकासशील देशों को हथियारों के प्रतिस्पर्धा पर लगाम लगाना होगा। इनके परीक्षण और प्रयोग से सर्वाधिक प्रदूषण फैलता है। अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए जाने के 71 वर्ष पूरे हो चुके हैं, बावजूद इसका विकिरण और दुष्प्रभाव वहाँ रहने वाले लोगों को झेलना पड़ रहा है। परमाणु संयन्त्रों से विकिरण का खतरा हमेशा बना रहता है, अतः इसपर रोक लगना चाहिए।

उपरोक्त विकल्पों और तरीकों को अपना कर हम प्रदूषण को नियंत्रित कर सकते हैं। आज हमें सोचना होगा कि प्रदूषण को रोकना सरकार और सामाजिक तथा पर्यावरण-संबंधी संस्थाओं की ही जिम्मेवारी नहीं है। यह हर नागरिक का परम कर्तव्य है को वह ऐसे गतिविधियों से दूर रहे जो प्रदूषण का कारण हैं। परिवार में बुजुर्गों का दायित्व है कि वे अपने बच्चों और छोटों को सही ज्ञान दे। उन्हें बताना चाहिए कि यदि पर्यावरण सुरक्षित रहेगी तभी हमारा पृथ्वी भी बच पाएगा। हमें ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए जो पर्यावरण को क्षति पहुँचाते हो। सभी देश विश्व को बचाने के लिए हर वर्ष शिखर सम्मेलन करते हैं, लेकिन हथियारों के इस्तेमाल और उत्पादन पर विराम नहीं लगाते। जब तक अमेरिका, चीन, जापान, रूस, इस्राइल, फ़्रांस आदि जैसे देश हथियारों की होड़ से दूर नहीं होते तो पृथ्वी को बचाने की हमारी सोच, सोच ही रह जाएगी क्योंकि पूरा विश्व तीसरे विश्व युद्ध के दरवाजे पर खड़ा है और ये कहने में तनिक भी अत्योशक्ति नहीं होगी कि यदि तीसरा विश्व युद्ध हुआ तो पृथ्वी का सर्वनाश निश्चित है।

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Thursday, 21 April 2016

स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है।

मानव के लिए अच्छे स्वास्थ्य से बढ़कर कुछ नहीं। स्वास्थ्य अच्छा हो तो सब कुछ अच्छा लगता है, हर कार्य में मन लगता है और हम अपने हर कार्यकलाप में आनंद ले पाते हैं।

स्वास्थ्य की महत्ता से हर व्यक्ति परिचित है, इसलिए वह स्वस्थ रहने के लिए हर प्रकार के उपाय करता है। हम स्वस्थ रहने के लिए नियमित व्यायाम और अपने खान-पान में सतर्कता बरतते हैं। जो लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही बरतते हैं वो बीमार पड़ते हैं अथवा किसी दुर्घटना के शिकार हो सकते हैं। अपने स्वास्थ्य की महत्ता को समझकर स्वस्थ तरीकों को अपनाने वाले दीर्घायु और प्रसन्नचित्त होते हैं।

हमारे पास ढेरों धन-संपत्ति हो और नौकर-चाकर हो, खुशी का उत्सव हो लेकर हम अस्वस्थ हों तो वो सारी खुशियाँ हमारे लिए निरर्थक साबित हो सकती हैं। हम इन खुशियों और धन-संपत्ति का वास्तविक आनंद लेने से वंचित हो जाते हैं।

स्वस्थ रहने के लिए अनेक प्रकार के उपाय किए जाते हैं। बच्चों को विद्यालय स्तर से शारीरिक शिक्षा प्रदान की जाती है ताकि वे स्वस्थ रहने के महत्व से परिचित हो। बच्चों को व्यायाम और सुपाच्य तथा स्वास्थ्यवर्धक भोज्य पदार्थों से परिचित करवाया जाता है।


अतः हमें भी अपने स्वास्थ्य को संतुलित रखने के लिए सतर्कता और सावधानी बरतनी चाहिए। 
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई

§  परिचय  झाँसी की रानी और 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना
§  जन्म- वाराणसी (काशी ) में 19  November 1835 में.
§  उपनाम- मणिकर्णिका, मनु, छबीली.
§  माता- भागीरथी बाई.
§  पिता- मोरोपंत तांबे.
§  माता की मृत्यु- मनु जब 4 वर्ष की थीं.
§  शिक्षा- शास्त्र और शस्त्र.
§  विवाह- 1842 में  झाँसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ.
§  संतान- 1851 में रानी ने दामोदर राव को जन्म दिया, पर 4 महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी.
§   दत्तक पुत्र-   रानी ने आनंद राव को गोद लिया , आनंद राव का नाम बाद में दामोदर राव दिया गया.
§   पति की मृत्यु- 21 November 1853.
 अंग्रेज और झाँसी
§    राज्य हड़पने की नीति- अंग्रेजों  ने दामोदर राव को झाँसी का उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया.
§  मार्च 1854 में, लक्ष्मीबाई को 60,000 रुपए पेंशन प्रस्ताव दिया गया और महल तथा  झांसी किला छोड़ने का आदेश दिया.
§   आर्थिक समस्या- अंग्रेजों  ने राज्य का खजाना ज़ब्त कर लिया
§   किला- रानी को झाँसी के किले को छोड़ कर झाँसी के रानीमहल में जाना पड़ा.
§   रानी का निश्चय- लक्ष्मीबाई ने हर कीमत पर झाँसी की अंग्रेजों से  रक्षा करने का निश्चय किया.
 युद्ध का मैदान
§   स्वयंसेवक सेना-  रानी ने एक स्वयंसेवक सेना का गठन किया. इस सेना में महिलाओं की भर्ती भी की गयी और उन्हें युद्ध प्रशिक्षण भी दिया गया.
§   साधारण जनता ने भी इस संग्राम में सहयोग दिया.
§   पड़ोसियों का हमला- 1857 के September तथा October माह में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया.
§   रानी ने सफलता पूर्वक इसे विफल कर दिया.
§   अंग्रेजों का हमला- 1858 के जनवरी माह में अंग्रेजी सेना ने झाँसी की ओर बढना शुरू कर दिया और मार्च में शहर को घेर लिया. दो हफ़्तों की लडाई के बाद अंग्रेजी सेना ने शहर पर कब्जा कर लिया. परन्तु रानी, दामोदर राव के साथ अंग्रेजों से बचने में सफल हो गयी.
§   किले पर कब्ज़ा- तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओं ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया.
§   मृत्यु-  17 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा-की-सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते  रानी लक्ष्मीबाई ने वीरगति पाई .
§  अपनी अद्भुत वीरता, युद्धकौशल, साहस, और कभी न खत्म होने वाले देश प्रेम के कारण एक साधारण सी लड़की मनुएक कालजयी वीरांगना बन गई. और आज भी वह करोड़ों लोगों की प्रेरणा है. लगभग 200 साल होने जा रहे हैं, इस मर्दानी के जन्म लिए…. लेकिन हर गुजरते दिन के साथ झाँसी की रानी की प्रासंगिकता कम होने के बजाए बढ़ती हीं जा रही है.
§  महारानी लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम मनु या छबीली (मणिकर्णिका) था.
§  19th November, 1835 को भारत माता की इस वीर बेटी का जन्म बनारस में एक गरीब ब्राह्मण मोरोपंत तांबे के घर में हुआ था.
§  उत्तम संस्कारों ने मनु को संस्कारी, देशप्रेमी, निर्बलों का दर्द समझने वाली और वीरांगना बनाया. तथा उसे अन्याय का दृढ़तापूर्वक सामना करना सिखाया.
§  वीरों की गाथाओं, धार्मिक तथा सांस्कृतिक गौरवगाथाओं ने मनु को दूसरों से अलग और श्रेष्ठ बना दिया.
§  मनु शारीरिक रूप से साधारण लोगों से बहुत ज्यादा मजबूत थी, और उनकी मानसिक चपलता और योग्यता अद्भुत थी.
§  अपने आसपास के लोगों पर होते अन्याय ने लक्ष्मीबाई के मन में अंग्रेजों के प्रति विद्रोह की भावना भर दी.
§  बचपन में हीं इनकी माँ की मृत्यु हो गई.
§  तलवारबाजी, घुड़सवारी, मल्लयुद्ध, वेश बदलने, दौड़, अनेक लोगों से अकेले लड़ने और युद्ध की रणनीति बनाने में वो सर्वश्रेष्ठ थीं.
§  गंगाधर राव के साथ इनका विवाह 1842 ई. में हुआ.
§  1851 ई. में लक्ष्मीबाई ने पुत्र को जन्म दिया. लेकिन नियति को यह कहाँ मंजूर था कि वह साधारण स्त्रियों की तरह वह पुत्र का सुख पाए. उनके पुत्र की मृत्यु 3 माह की अवस्था में हीं हो गई.
§  लक्ष्मीबाई फिर गर्भवती हुईं, लेकिन कर्तव्य पथ पर सतत चलने वाली इस वीरांगना को गर्भावस्था में भी आराम नसीब नहीं हुआ. नतीजा यह हुआ कि लक्ष्मीबाई का गर्भपात हो गया. पहले पुत्र की असमय मृत्यु और फिर माँ न बनने का दुःख सहने के बावजूद यह वीरांगना अपने कर्तव्य पथ से एक पल के लिए भी नहीं डिगी.
§  इसके बाद राजा ने एक पुत्र गोद लिया, बच्चे का नाम दामोदर राव रखा गया. अंग्रेजों ने उस बच्चे को उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया. और झाँसी को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने का कार्य शुरू कर दिया.
§  रानी ने अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत कर दी.
§  झाँसी की सेना के आगे अंग्रेज खुद को बेबस पाने लगे, रानी की किलाबंदी और व्यूहरचना अंग्रेजों पर भारी पड़ने लगी.
§  घोड़े पर सवार हो, पीठ में बच्चे को बांधकर और दोनों हाथों में तलवार लेकिन यह वीरांगना अंग्रेजों पर किसी शेरनी की भांति टूट पड़ी. क्रूर अंग्रेज भी यह समझ गए थे कि बिना छल किये, वो ये लड़ाई नहीं जीत सकते हैं.
§  गद्दारों और झाँसी के धनाढ्यों के अंग्रेजों का साथ देने के कारण, रानी और उनकी छोटी सी सेना कमजोर पड़ने लगी.
§  झाँसी की स्त्री सेना ने भी अंग्रेजों में भारी मार-काट मचाई, लेकिन धन की कमी और सेना के छोटे होने के कारण अंग्रेजों ने झाँसी के किले पर कब्जा कर लिया.
§  लक्ष्मीबाई घायल हो गई, एक अंग्रेज ने पीछे से धोखे से रानी पर वार कर दिया. अत्यंत घायल हो चुकी रानी ने फिर भी उन अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया.
§  रानी के सेनापति गौस खान ने घायल रानी को बाबा गंगादास की कुटिया में पहुंचाया. उसी कुटिया में जल पीने के बाद इस वीरांगना ने दम तोड़ दिया.
§  रानी यह चाहती थी कि मरने के बाद भी अंग्रेज उनके शव तक को हाथ न लगायें. इसलिए बाबा गंगादास ने अपनी कुटिया को हीं चिता का रूप दिया और अपनी कुटिया में में हीं उनका अग्निसंस्कार किया.
§  इस तरह महारानी लक्ष्मीबाई मरने के बाद भी कालजयी बन गई.
§  1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की यह वीरांगना आज भी करोड़ों लोगों की प्रेरणा है.
§  17 जून 1858 को यह वीरांगना वीरगति को प्राप्त हुई।