Friday, 16 June 2017

विद्या सबसे बड़ा धन है ।

विद्या सबसे बड़ा धन है ।
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विद्या को सबसे बड़ा धन माना गया है। मानव को सभी जीव जन्तुओ में सर्वोत्तम माना गया है क्योंकि मानव ने अपने विद्या और बुद्धि के बल पर प्रकृति को अपने वश में कर रखा है। विद्या का ही परिणाम है कि हम अपने विवेक का प्रयोग कर आसानी से जीवन निर्वहन कर पा रहे हैं। संसार में इसी कारण मानव को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

जब तब मानव विद्या से वंचित होता है, उसका जीवन पशु सदृश होता है। मानव जीवन में हम जन्म के साथ ही विभिन्न स्थितियों में विद्या ग्रहण करते हैं। प्रारम्भिक अवस्था में शिशु अपने माता-पिता से जीवन के संस्कार और बोलना सीखता है। इसके पश्चात उसे विद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा जाता है और इसके उपरांत उच्चतर संस्थानों में वे प्रवेश लेते हैं। ये सारा प्रक्रम मानव में विद्या को समाहित करने के लिए किया जाता है। पहले अपने परिवार में और फिर शिक्षण संस्थानों में हम जीवन के बहुत सी बातें सीखते हैं। लिखना, पढ़ना और तकनीकी बातों का ज्ञान मनुष्य को चिंतनशील और प्रखर बनाता है। इस प्रकार मानव मस्तिष्क विद्या को ग्रहण कर परिस्थितियों के अनुरूप जीने की कला सीख जाता है।

इतिहास साक्षी है कि जिसने भी विद्या को सर्वोत्तम रूप में चुना और उसका अनुकरण किया वो इतिहास में अमिट छाप छोड़ने में सफल रहा। कालीदास इसी के बल पर एक महान कवि और लेखक के रूप में प्रख्यात हुआ। विद्या को ऐसा धन माना गया है जो जितना खर्च किया जाये उतना बढ़ता है, जो इसका प्रचार प्रसार नहीं करता और इसे संचित रखता है उसकी विद्या नष्ट हो जाती है। इसलिए विद्या पर ये श्लोक चरितार्थ होते हैं :-

विद्या ददाति विनयम, विनायत याति पात्रताम ।
पात्रत्वात धनमाप्नोती धनात धर्मं ततः सुखम ॥

इसका अर्थ है कि विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता आती है।  पात्रता से धन और धन से धर्म तथा सुख की प्राप्ति होती है।।  

विद्या नाम नरस्य रूपमधिकम प्रच्छन्न्गुप्तम धनम, विद्या भोगकारी यशः सुखकरी विद्या गुरुणाम गुरुः ।
विद्या बंधुजनों विदेशगमने विद्या परम दैवतम, विद्या राजसु पूज्यते न ही धनम विद्याविहीन पशु     । ।

इसका अर्थ है की विद्या मनुष्य का विशिष्ट रूप है, गुप्त धन है। वह भोग देने वाली, यशदातरी, और सुखकारक है। विद्या गुरुवो का गुरु है, विदेश में वह मनुष्य का भाई के समान है। विद्या सबसे बड़ा देवता है। विद्या राजाओं में पूजी जाती है, धन नहीं। इसलिए विद्या विहीन पशु के समान है।
अतः हम कह सकते हैं कि हमें पूरे जीवन भर कहीं से भी अच्छी विद्या प्राप्त होती है तो उसे सीखने पर ध्यान देना चाहिए। यह हमारे, हमारे परिवार और समाज के लिए हितकारी हो सकता है।



Thursday, 25 May 2017

साँच बराबर तप नहीं, न झूठ बराबर पाप ?

साँच बराबर तप नहीं, न झूठ बराबर पाप ?
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यह सूक्ति निर्गुण भक्ति मार्गी कवि कबीरदास जी ने कही है कि सच्चाई से बढ़कर कोई तपस्या नहीं है। इस सूक्ति पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना आवश्यक है कि सच्चाई के समान या सच्चाई से बढ़कर कोई तपस्या नहीं है, तो कैसे और क्यों नही है?
सबसे पहले हमें सच्चाई का स्वरूप, अर्थ और प्रभाव को समझना होगा। सच्चाई का शाब्दिक अर्थ है- सत्य का स्वरूप या सत्यता। सत्य का स्वरूप क्या है और क्या हो सकता है, यह भी विचारणीय है। सच्चाई शब्द या सच शब्द का उद्भव संस्कृत के सत शब्द में प्रत्यय लगा देने से बना है। यह सत्य शब्द संस्कृत का शब्द अस्ति के अर्थ से हैं, जिसका अर्थ क्रिया से है। अस्ति क्रिया का अर्थ होता है। इस क्रियार्थ को एक विशिष्टि अर्थ प्रदान किया गया कि जो भूत, वर्तमान और भविष्य में भी रहे या बना रहे, वही सत्य है।
सत्य का स्वरूप बहुत ही विस्तृत और महान होता है। सत्य के सच्चे स्वरूप का ज्ञान हमें तब हो सकता है, जब हम असत्य का ज्ञान प्राप्त कर लें। असत्य से हमें क्या हानि होती है और असत्य हमारे लिए कितना निर्मम और दुखद होता है। इसका बोध जब हमें भली भाँति हो जायेगा तब हम सत्य की महानता का बोध स्वयं कर सकेंगे। गोस्वामी तुलसीदास ने इस संदर्भ में एक बहुत ही उच्चकोटि की सूक्ति प्रस्तुत की है-
नहिं असत्य सम पातक पूँजा।
गिरि सम होइ कि कोटिक गूँजा।।

अर्थात् असत्य के समान कोई पापपूँज नहीं है और असत्य को पाप पूँज पर्वत के समान करोड़ गुनी ध्वनि अर्थात् भयंकर हो सकता है।
सत्य का आचरण करने वाला व्यक्ति सच्चरित्रवान होकर महान बनता है। वह सत्य को अपने जीवन का परमोउदेश्य मान लेता है। इसके लिए वह कोई कोर कसर नहीं छोड़ता है। इसके लिए वह अपने प्राणों की बाजी लगाने में भी नहीं कतराता है। सत्य का आचरण करके व्यक्ति देवत्व की श्रेणी को प्राप्त कर लेता है और अपने सत्कर्मों और आदर्शों से वह वन्दनीय और पूजनीय बन जाता है। कबीरदास ने सत्य का महत्वांकन करते हुए कहा था-
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हदय साँच है, ताको हदय आप।।
अर्थात् सत्य के समान कोई तपस्या नहीं है और झूठ के समान कोई पाप नहीं है। जिसके हदय में सत्य का वास है, उसी के हदय के परमात्मा का निवास है। इस अर्थ का तात्पर्य यह है कि सत्य ऐसी एक महान तपस्या है, जिससे बढ़कर और कोई तपस्या नहीं हो सकती है। इसी तरह से झूठ एक ऐसा घोर पाप है, जिससे बढ़कर और कोई पाप नहीं हो सकता है। अतएव सत्य रूपी तपस्या के द्वारा ही ईश्वर की प्राप्ति सम्भव होती है। कहने का भाव यह है कि सत्य का घोर साधना है, जिसकी प्राप्ति मानवता की प्राप्ति है, देवत्व की प्राप्ति है और यही जीवन की सार्थकता है।
संसार में अनेकानेक महामानवों ने सत्यानुसरण करके सत्य का महत्व सिद्ध किया है। राजा दशरथ ने अपने सत्य वचन के पालन के लिए ही प्राण प्यारे राम को बनवास देने में तनिक भी देर नहीं लगाई और अपने प्राणों का त्याग यह कहकर सहज ही कर दिया था-
रघुकुल रीति सदा चलि गई। प्राण जाई पर वचन न जाई।।
राजा दशरथ से पूर्व सत्यवादी हरिशचन्द्र ने सत्य का अनुसरण करते हुए अपने को डोम के हाथ तथा अपनी पत्नी और पुत्र को एक ब्राहमण के हाथ बेच करके घोरतम कष्ट और विपदाओं को सहने का पूरा प्रयास किया, लेकिन इस ग्रहण किए हुए सत्यपथ से कभी पीछे कदम नहीं हटाया। इसी प्रकार से महाभारत काल में भी सत्य का पालन करने के लिए भीष्म पितामह ने कभी भी अपनी सत्य प्रतिज्ञाओं का निर्वाह करने में हिम्मत नहीं हारी। आधुनिक युग में महात्मा गाँधी की सत्याग्रह सत्य को चरितार्थ करने में पूर्णत सफल सिद्ध होता है। उनका सत्याग्रह आज भी कार्यशील है, और प्रभावशाली भी है।
सत्यं, शिवम् और सुन्दरम ही परमात्मा का सम्पूर्ण स्वरूप है। उसमें सत्य प्रथम है। वास्तव में सत्य की महिमा सर्वोपरि है, सर्वाधिक है।

झूठ को बहुत बड़ा पाप माना गया है, जो लोग झूठ बोलते हैं उन्हें सर्वदा पश्चाताप की आग में जलना पड़ता है। यदि कोई एक झूठ बोलता है तो उसे इस झूठ को छिपाने के लिए फिर कई झूठ बोलने पड़ते हैं। झूठ की सबसे बड़ी कमी है कि यदि हम कभी झूठ बोलते हैं तो उसे याद रखना पड़ता है ताकि अगले को कोई शक न हो जाए या हमसे कोई गलती न हो जाए। अतः सत्य को सर्वश्रेष्ठ माना गया है और ऊपर कही गयी उक्ति सार्थक सिद्ध होती है। 

Monday, 15 May 2017

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

                          बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ 

पूरे भारत में लड़कियों को शिक्षित बनाने और उन्हें बचाने के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ नाम से लड़कियों के लिये एक योजना की शुरुआत की। इसका आरंभ हरियाणा के पानीपत में 22 जनवरी 2015, गुरुवार को हुआ। पूरे देश में हरियाणा में लिंगानुपात 775 लड़कियाँ पर 1000 लड़कों का है जो बेटीयों की दयनीय स्थिति को दर्शाता है इसी वजह से इसकी शुरुआत हरियाणा राज्य से हुई। लड़कियों की दशा को सुधारने के लिये पूरे देश के 100 जिलों में इसे प्रभावशाली तरीके से लागू किया गया है, सबसे कम स्त्री-पुरुष अनुपात होने की वजह से हरियाणा के 12 जिलों (अंबाला, कुरुक्षेत्र, रिवारी, भिवानी, महेन्द्रगण, सोनीपत, झज्जर, रोहतक, करनाल, यमुना नगर, पानीपत और कैथाल) को चुना गया।
लड़कियों की दशा को सुधारने और उन्हें महत्व देने के लिये हरियाणा सरकार 14 जनवरी को ‘बेटी की लोहड़ी’ नाम से एक कार्यक्रम मनाती है। इस योजना का उद्देश्य लड़कियों को सामाजिक और आर्थिक रुप से स्वतंत्र बनाना है जिससे वो अपने उचित अधिकार और उच्च शिक्षा का प्रयोग कर सकें। आम जन में जागरुकता फैलाने में ये मदद करता है साथ ही महिलाओं को दिये जाने वाले लोक कल्याणकारी सेवाएँ की कार्यकुशलता को भी बढ़ाएगा। अगर हम 2011 के सेंसस रिपोर्ट पर नजर डाले तो हम पाएँगे कि पिछले कुछ दशकों से 0 से 6 वर्ष के लड़कियों की संख्या में लगातार गिरावट हो रही है। 2001 में ये 927/1000 था जबकि 2011 में ये और गिर कर 919/1000 पर आ गया। अस्पतालों में आधुनिक लक्षण यंत्रों के द्वारा लिंग पता करने के बाद गर्भ में ही कन्या भ्रूण की हत्या करने की वजह से लड़कियों की संख्या में भारी कमी आयी है। समाज में लैंगिक भेदभाव की वजह से ये बुरी प्रथा अस्तित्व में आ गयी।
जन्म के बाद भी लड़कियों को कई तरह के भेदभाव से गुजरना पड़ता है जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, खान-पान, अधिकार आदि दूसरी जरुरतें है जो लड़कियों को भी प्राप्त होनी चाहिये। हम कह सकते हैँ कि महिलाओं को सशक्त करने के बजाय अशक्त किया जा रहा है। महिलाओं को सशक्त बनाने और जन्म से ही अधिकार देने के लिये सरकार ने इस योजना की शुरुआत की। महिलाओं के सशक्तिकरण से सभी जगह प्रगति होगी खासतौर से परिवार और समाज में। लड़कियों के लिये मानव की नकारात्मक पूर्वाग्रह को सकारात्मक बदलाव में परिवर्तित करने के लिये ये योजना एक रास्ता है। ये संभव है कि इस योजना से लड़कों और लड़कियों के प्रति भेदभाव खत्म हो जाये तथा कन्या भ्रूण हत्या का अन्त करने में ये मुख्य कड़ी साबित हो। इस योजना की शुरुआत करते हुए पीएम मोदी ने चिकित्सक बिरादरी को ये याद दिलाया कि चिकित्सा पेशा लोगों को जीवन देने के लिये बना है ना कि उन्हें खत्म करने के लिये। 
इस प्रकार कहा जा सकता है कि यह भारतीय सरकार की एक अति महत्वाकांक्षी योजना है और सरकार की ये सोच है की बेटियों को समाज के हर तबके में उच्च स्थान दिलाया जा सके। आर्थिक व सामाजिक पिछड़ेपन को खत्मकर इनकी बेड़ियों को हटाया जा सके। समाज तभी उन्नति करेगा जब नारी को पुरुष के अनुरूप ही अधिकार प्राप्त होंगे, इनके अभाव में हम कितनी भी बड़ी बातें कर ले सब व्यर्थ होंगे। 

Friday, 7 April 2017

नरेन्द्र दामोदरदास मोदी

नरेन्द्र दामोदरदास मोदी
भूमिकाः नरेन्द्र दामोदरदास मोदी 17 सितंबर 1950 को जन्मे भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री हैं। भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उन्हें 26 मई 2014 में विघिवत प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई। वे स्वतन्त्र भारत के 15वें प्रधानमंत्री हैं। उनके नेतृत्व में भारत के प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा और 282 सीटें जीतकर अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। एक सांसद के रूप में उन्होंने उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक नगरी वाराणसी एवं अपने गृह राज्य गुजरात के बड़ोदरा संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा और दोनों जगहों से जीत हासिल की। इससे पूर्व वे गुजरात राज्य के 14वें मुख्यमंत्री रहे। उन्हें उनके काम के कारण गुजरात की जनता ने लगातार चार बार (2001-2014) मुख्यमंत्री चुना।
गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त विकास पुरूष के नाम से जाने जाते हैं और वर्तमान समय में देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं।
नरेन्द्र मोदी का जन्म तत्कालीन बम्बें राज्य के मेहशाना जिला स्थित बड़नगर ग्राम हीनाबेन मोदी और दामोदरदास मूलचन्द मोदी के एक मध्यम वर्ग परिवार में 17 सितम्बर 1950 को हुआ था। वे पूर्णतः शाकाहारी हैं। भारत पाकिस्तान के बीच द्वितीय युद्ध के दौरान अपने तरूण काल में उन्होंने स्वेच्छा से रेलवे स्टेशनों पर सफर कर रहे सैनिकों की सेवा की। युवावस्था में वे छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में शामिल हुए और साथ ही साथ भ्रष्टाचार विरोधी नव निर्माण आन्दोलन में हिस्सा लिया। एक पूर्ण कार्यकालिक आयोजक के रूप में कार्य करने के बाद उन्हें भारतीय जनता पार्टी में संगठन का प्रतिनिधि मनोनीत किया गया।
किशोरावस्वथा में अपने भाई के साथ एक चाय की दुकान चला चुके मोदी ने अपनी स्कूली शिक्षा बड़नगर में पूरी की। उन्होंने आर.एस.ए. के प्रचारक रहते हुए 1980 में गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर परीक्षा पास की।
अपने माता पिता की कुल छह सन्तानों में तीसरे पुत्र नरेन्द्र ने बचपन में रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने में अपने पिता का भी हाथ बटाया। बड़नगर के ही एक स्कूल मास्टर के अनुसार नरेन्द्र हालांकि एक औसत दर्जे का छात्र था लेकिन वाद विवाद और नाटक प्रतियोगिताओं में उसकी बेहद रूचि थी। 13वें वर्ष की आयु में नरेन्द्र की सगाई जशोदाबेन चमनसाल के साथ कर दी गई। जब उनका विवाह हुआ तब वे मात्र 17 वर्ष के थे। नरेन्द्र मोदी के जीवनी लेखकों के अनुसार उन दोनों की शादी जरूर हुई परन्तु वे दोनों एक साथ कभी नहीं रहे। शादी के कुछ वर्षों बाद नरेन्द्र ने घर त्याग दिया और एक प्रकास से उनका वैवाहिक जीवन समाप्त सा हो गया।
प्रारम्भिक राजनीति सक्रियता और राजनीति
नरेन्द्र जब विश्वविद्यालय के छात्र थे तभी वे आर.एस.ए. की शाखा में नियमित जाने लगे थे। इस प्रकार उनका जीवन संघ के एक निष्ठावान प्रचारक के रूप में प्रारम्भ हुआ। उन्होंने शुरूआती जीवन से ही राजनीतिक सक्रियता दिखलाई और भारतीय जनता पार्टी का आधार मजबूत करने में प्रमुख भूमिका निभाई।
1995 में राष्ट्रीय मंत्री के नाते उन्हें पाँच प्रमुख राज्यों में पाटीं का संगठन का काम दिया गया जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। 1998 में उन्हें पदोन्नत करके राष्ट्रीय महामंत्री का उत्तरदायित्व दिया गया। भारतीय जनता पार्टी ने अक्टूबर 2001 में केशवभाई पटेल को हटाकर गुजरात की मुख्यमंत्री पद की कमान नरेन्द्र को सौंप दी।
2014 का लोक सभा चुनावः गोआ में भाजपा कार्य समीति द्वारा नरेन्द्र मोदी की 2014 की लोक सभा की चुनाव की कमान सौंपी गई। 13 सितम्बर 2013 को उन्हें लोक सभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया।

परिणामः नरेन्द्र मोदी के नेतृत्त्व में 16वें लोक सभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन 336 सीटें जीत कर सबसे बड़ी संसदीय दल के रूप में उभरे वहीं अकेले भारतीय जनता पार्टी ने 282 सीटें जीतीं। नरेन्द्र मोदी स्वतन्त्र भारत में जन्म लेने वाले ऐसे व्यक्ति हैं जो सन 2001 से 2014 तक लगभग 13 साल गुजरात के 14वें मुख्यमंत्री रहे और हिन्दुस्तान के 15वें प्रधानमंत्री बने।

राष्ट्रीय एकता

राष्ट्रीय एकता
हमारा भारत देश विश्व के मानचित्र पर एक विशाल देश के रूप में चित्रित है। प्राकृतिक रचना के आधार पर तो भारत के कई अलग अलग रूप और भाग हैं। उत्तरी का पर्वतीय भाग, गंगा-यमुना सहित अन्य नदियों का समतलीय भाग, दक्षिण का पठारी भाग और समुन्द्र तटीय मैदान। भारत का एक भाग दूसरे भाग से अलग थलग पड़ा हुआ है। नदियों और पर्वतों के कारण ये भाग एक दूसरे से मिल नहीं पाते हैं। इसी प्रकार से जलवायु की विभिन्नता और अलग अलग क्षेत्रों के निवासियों के जीवन आचरण के कारण भी देश का स्वरूप एक दूसरे से विभिन्न और पृथक पड़ा हुआ दिखाई देता है।
इन विभिन्नताओं के होते हुए भी भारत एक है। भारतवर्ष की निर्माण सीमा ऐतिहासिक है। वह इतिहास की दृष्टि से अभिन्न है। इस विषय में हम जानते हैं कि चन्द्रगुप्त, अशोक, विक्रमादित्य और बाद मुगलों ने भी इस बात की बड़ी कोशिश थी कि किसी तरह सारा देश एक शासक के अधीन लाया जा सके। उन्हें इस कार्य में कुछ सफलता भी मिली थी। इस प्रकार के भारत की एकता ऐतिहासिक दृष्टि से एक ही सिद्ध होती है।
हमारे देश की एकता एक बड़ा आधार दर्शन और साहित्य है। हमारे देश का दर्शन सभी प्रकार की भिन्नताओं और असमानताओं को समाप्त करने वाला है। यह दर्शन है- सर्वसमन्वय की भावना का पोषक। यह दर्शन किसी एक भाषा में नहीं लिखा गया है। अपितु यह देश की विभिन्न भाषाओं में लिखा गया है। इसी प्रकार से हमारे देश का साहित्य विभिन्न क्षेत्र के निवासियों के द्वारा लिखे जाने पर भी क्षेत्रवादिता या प्रान्तीयता के भावों को नहीं उत्पन्न करता है, बल्कि सबके लिए भाईचारे और सद्भाव की कथा सुनाता है। मेल-मिलाप का सन्देश देता हुआ देश भक्तों के भावों को जगाता है। इस प्रकार के साहित्य की लिपि भी पूरे देश की एक ही लिपि है- देवनागरी लिपि। प्रख्यात विचारक कविवर दिनकर जी का इस सम्बन्ध में इसी प्रकार का विचार था-
विचारों की एकता जाति की सबसे बड़ी एकता होती है। अतएव भारतीय जनता की एकता के असली आधार भारतीय दर्शन और साहित्य हैं, जो अनेक भाषाओं में लिखे जाने पर भी अन्त में जाकर एक ही साबित होते हैं। यह भी ध्यान देने की बात है कि फारसी लिपि को छोड़ दें, तो भारत की अन्य सभी लिपियों की वर्णमाला एक ही है। यद्यपि यह अलग अलग लिपियों में लिखी जाती है।
यद्यपि हमारे देश की भाषा एक नहीं अनेक हैं। यहाँ पर लगभग पन्द्रह भाषाएँ हैं। इन सभी भाषाओं को बोलियाँ अर्थात् उपभाषाएँ भी हैं। सभी भाषाओं को सविधान से मान्यता मिली है। इन सभी भाषाओं से रचा हुआ साहित्य हमारी राष्ट्रीय भावनाओं से ही प्रेरित है। इस प्रकार से भाषा भेद की भी ऐसी कोई समस्या नहीं दिखाई देती है, जो हमारी राष्ट्रीय एकता को खंडित कर सके। उत्तर भारत का निवासी दक्षिणी भारत के निवासी की भाषा को न समझने के बावजूद उसके प्रति कोई नफरत की भावना नहीं रखता है। रामायण, महाभारत आदि ग्रन्थ हमारे देश की विभिन्न भाषाओं में तो हैं, लेकिन इनकी व्यक्त हुई भावना हमारी राष्ट्रीयता को ही प्रकाशित करती है। तुलसी, सूर, कबीर, मीरा, नानक, रैदास, तुकाराम, विद्यापति, रवीन्द्रनाथ टैगोर, ललदेव, तिरूवल्लुवर आदि की रचनाएँ एक दूसरी की भाषा से नहीं मिलती है। फिर भी इनकी भावात्मक एकता राष्ट्र के सांस्कृतिक मानस को ही पल्लवित करने में लगी हुई है।
हमारे देश की परम्पराएँ, मान्यताएँ, आस्थाएँ जीवन मूल्य सभी कुछ हमारी राष्ट्रीयता के ही पोषक हैं। पर्व-तिथि-त्योहार की मान्यताएँ यद्यपि अलग अलग हैं, फिर भी सबसे एकता और सर्वसमन्वय का ही भाव प्रकट होता है। यही कारण है कि एक जाति के लोग दूसरी जाति के तिथि पर्व त्योहारों में शरीक होकर आत्मीयता की भावना को प्रदर्शित करते हैं। धर्म के प्रति आस्था ओर विश्वास की भावना हमारी जातीय वर्ग को प्रकट करते हैं। अतएव धर्मों के मूल में कोई भेछ नहीं है।  यही कारण है कि हमारे देश में न केवल राष्ट्रयीता के पोषक विभिन्न प्रकार के धर्मों को अपनाने की पूरी छूट हमारे संविधान ने दे दी है, अपितु संविधान की इस छूट के कारण ही भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की संज्ञा भी दे दी। इसका यह भी अर्थ है कि यहाँ का कोई धर्म किसी दूसरे धर्म में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।
भारत की एकता की सबसे बड़ी बाधा थी- ऊँचे-ऊँचे पर्वत, बड़ी-बड़ी नदियां, देश का विशाल क्षेत्रफल आदि। जनता इन्हें पार करने में असफल हो जाती थी। इससे एक दूसरे से सम्पर्क नहीं कर पाते थे। आज की वैज्ञानिक सुविधाओं के कारण अब यह बाधा समाप्त हो गई है। देश के सभी भाग एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इस प्रकार हमारी एकता बनी हुई है।
हमारे देश की एकता का सबसे बड़ा आधार प्रशासन की एकसूत्रता है। हमारे देश का प्रशासन एक है। हमारा संविधान एक है और हम दिल्ली में बैठे बैठे ही पूरे देश पर शासन करने में समर्थ हैं।


राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा)

राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा)
प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र का अपना एक चिन्ह या प्रतीक होता है। जिससे उसकी पहचान बनती है। राष्ट्रीय ध्वज हर राष्ट्र के गौरव का प्रतीक होता है।
तिरंगाहमारा राष्ट्रीय ध्वज है। हमारा देश भारत विविध जातियों, धर्मों और संस्कृतियों को देश है। इसी प्रकार हमारा ध्वज भी भाव प्रधान है। हमारे राष्ट्र के झंडे में तीन रंग हैं इसीलिये इसे तिरंगा कहते हैं। झंडे में तीन रंगों की पट्टियाँ हैं। जिनका आकार समान है। झंडे के सबसे ऊपर केसरिया रंग है जो वीरता और शौर्य को प्रकट करता है। बीच का हिस्सा सफेद रंग हा है जो पवित्रता, त्याग भावना एवं सादगी का प्रतीक है। नीचे के भाग का हरा रंग हमारे देश की हरी भरी धरती और सम्पन्नता को दर्शाता है। ध्वज की मध्य सफेद पट्टी पर अशोक चक्र बना है। नीले रंग के अशोक चक्र में 24 लाइनें हैं। अशोक चक्र धर्म, विजय एवं प्रगति का द्योतक है।
हमारी स्वतंत्रता की लड़ाई में तिरंगे की एक मुख्य भूमिका रही। 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद यह हमारा राष्ट्रीय ध्वज बना। राष्ट्रीय समारोहों एवं महत्वपूर्ण अवसरों पर एक राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है।
राष्ट्रीय ध्वज प्रत्येक राष्ट्र की शान होता है। राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। राष्ट्रीय ध्वज का अपमान दण्डनीय अपराध है।

लहराता हुआ तिरंगा प्रत्येक भारतीय को राष्ट्र प्रेम की भावना से ओत प्रोत कर देता है।

विद्यालय का वार्षिकोत्सव

विद्यालय का वार्षिकोत्सव
विद्यालय का वार्षिकोत्सव का अर्थ है- एक साल के अंत में होने वाला उत्सव। प्रत्येक विद्यालय का वार्षिक उत्सव होता है। इस अवसर पर विशेष समारोह किए जाते हैं और इस समारोह में विद्यालय के सभी सदस्य सामान्य या प्रमुख रूप से भाग लिया करते हैं। इसलिए इस उत्सव का विशेष महत्व होता है-
प्रत्येक विद्यालय की तरह हमारे विद्यालय का भी वार्षिकोत्सव प्रतिवर्ष बसंत पंचमी के शुभावसर पर सम्पन्न किया जाता है। इस उत्सव के लिए विशेष प्रबन्ध और आयोजन किए जाते हैं। इसकी तैयारियाँ महीनों पूर्व ही होने लगती हैं। इसमें सभी अध्यापक, छात्र, कर्मचारी सक्रिय रूप से भाग लिया करते हैं। प्रधानाचार्य की भूमिका बहुत बड़ी होती है। वे इस कार्य को सम्पन्न कराने के लिए पुरजोर प्रयास किया करते हैं। न केवल विद्यालय की ही तैयारी करवानें में वे लगे रहते हैं, अपितु इससे सम्बन्धित बाहर की भी तैयारियों में विशेष रूचि और भाव प्रकट करते हैं। इसलिए हमारे विद्यालय का यह वार्षिकोत्सव एक विशेष आयोजन और समारोह के साथ प्रतिवर्ष सम्पन्न हुआ करता है।
प्रतिवर्ष की भाँति इस वर्ष भी बसंत पंचमी के शुभदिन हमारे विद्यालय का वार्षिकोत्सव सम्पन्न करने के लिए बड़ी धूमधाम और जोर शोर के साथ तैयारियाँ होने लगीं। हमारे प्रधानाचार्य जी ने अपनी रूचि और क्षमता का परिचय आरम्भ से देना ही शुरू कर दिया था। इस समारोह में आयोजित कार्यक्रमों की सूची एक माह पूर्व ही संचालक महोदय ने जारी कर दी थी जिसके परिणामस्वरूप इसमें भाग लेने के इच्छुक पात्रों ने अपनी अलग अलग तैयारियाँ भी आरम्भ कर दी थी।
इस क्रायकर्म के मुख्य आकर्षक थे- नाटक, कविता, वाद-विवाद और खेल कूद। सभी पात्रों ने इसमें भाग लेना आरम्भ कर दिया था। संचालक महोदय ने सबकी योग्यता की पहचान करके सबकों अलग अलग विषय दे दिया था। दूसरी और इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए दूर दूर से महान पुरूषों, जिनमें कुछ तो उच्च पदाधिकारी थे और कुछ बहुत बड़े सामाजिक व्यक्ति और सभ्रांत पुरूष भी थे, आमन्त्रित किये गये। विद्यार्थियों के परिवार के प्रमुख सदस्यों को भी इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। इससे विद्यालय के विद्यार्थियों में एक बड़ी खुशी की लहर उट रही थी और उनके साथियों को इससे कहीं और ही अधिक प्रसन्नता थी।
बड़ी प्रतीक्षा के बाद विद्यालय के वार्षिकोत्सव का वह शुभदिन बसंत पंचमी आ गयी। इस दिन सभी आमंत्रित और सम्बन्धित व्यक्ति एक एक करके विद्यालय के प्रमुख द्वार से अन्दर प्रवेश कर रहे थे। विद्यालय के इस प्रमुख द्वार के दोनों दी ओर दो वरिष्ठ अध्यापक अतिथियों के सम्मानपूर्वक स्वागत कार्य में लगे थे। विद्यालय के विशाल प्रांगण में एक बड़ा मंच बना हुआ था। आस पास कई कुर्सियां थीं, जो अभी तक रिक्त थीं। धीरे धीरे विद्यालय के सदस्य इस मंच के चौड़ी और पंक्तिबद्ध कुर्सियों पर आसन ग्रहण करते गए। विद्यालय के सभी विद्यार्थी और अन्य कर्मचारी गण भी यथा स्थान बैठ गए थे। जब प्रधानाचार्य के अपने लाउड हेलर से सबको यथा स्थान बैठ जाने पर निर्देश दिया तब जो अभी तक खड़े खड़े इस भव्य दृष्य का दर्शन कर रहे थे, वे भी यथास्थान बैठ गए।
वार्षिकोत्सव का कार्यक्रम दिन के 10 बजे के समय से संचालक महोदय के सूचनाबद्ध सम्भाषण से आरम्भ हुआ। इसके बाद विद्यालय के वरिष्ठ अध्यापक के संक्षिप्त सूचनाबद्ध और कार्यक्रम के महत्व तथा विद्यालय के विशेष महत्व को रेखांकित करने के सम्भाषण से कुछ देर तक कार्यक्रम चला। इसके बाद विद्यालय के प्रधानाचार्य ने अतिथियों के प्रति आभार प्रकट करते हुए उनके आगमन के प्रति अपनी खुशी भी प्रकट की। इसके बाद प्रधानाचार्य ने मुख्य अतिथि प्रदेश के शिक्षामंत्री के प्रति अपना हार्दिक आभार प्रकट करते हुए उन्हें अपने सम्भाषण से सबको कुछ ज्ञान लाभ प्रदान करने का आग्रह किया।
प्रधानाचार्य के कथनानुसार शिक्षामंत्री ने शिक्षा के महत्व पर एक लम्बा व्याखान देते हुए विद्यालय की प्रगति के लिए एक विशेष अनुदान देने की घोषणा भी कर दी। इसे सुनकर कई बार तालियों की गड़गड़ाहट होने से पूरा मंच गूँज उठा था। बाद में प्रधानाचार्य ने विद्यालय की प्रगति की रूप रेखा प्रस्तुत की। अंत में शिक्षामंत्री के कर कमलों द्वारा कार्यक्रमों में भाग लेने वाले उत्तीर्ण और यौग्य पात्रों को पुरस्कार भी प्रदान किया गया। अन्त में संचालक महोदय ने धन्यवाद प्रकाशन करते हुए इस समारोह की समाप्ति की घोषणा कर दी थी। सबसे अंत में मिष्ठान वितरण हुआ।
घर लौटते हुए सबके मुंह से विद्यालय की प्रगति की बातें बार बार निकल रही थी। सभी विद्यालय के इस वार्षिक समारोह से संतुष्ट और प्रसन्न थे। दूसरे दिन समाचार पत्रों ने भी इस समारोह के आयोजन और कार्यक्रमों की सम्पन्नता को विस्तारपूर्वक प्रकाशित किया। इसे पढ़ पढ़कर सभी हमारे विद्यालय के महत्व को बार बार कह सुन रहे थे।