Friday, 7 April 2017

नरेन्द्र दामोदरदास मोदी

नरेन्द्र दामोदरदास मोदी
भूमिकाः नरेन्द्र दामोदरदास मोदी 17 सितंबर 1950 को जन्मे भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री हैं। भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उन्हें 26 मई 2014 में विघिवत प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई। वे स्वतन्त्र भारत के 15वें प्रधानमंत्री हैं। उनके नेतृत्व में भारत के प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा और 282 सीटें जीतकर अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। एक सांसद के रूप में उन्होंने उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक नगरी वाराणसी एवं अपने गृह राज्य गुजरात के बड़ोदरा संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा और दोनों जगहों से जीत हासिल की। इससे पूर्व वे गुजरात राज्य के 14वें मुख्यमंत्री रहे। उन्हें उनके काम के कारण गुजरात की जनता ने लगातार चार बार (2001-2014) मुख्यमंत्री चुना।
गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त विकास पुरूष के नाम से जाने जाते हैं और वर्तमान समय में देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं।
नरेन्द्र मोदी का जन्म तत्कालीन बम्बें राज्य के मेहशाना जिला स्थित बड़नगर ग्राम हीनाबेन मोदी और दामोदरदास मूलचन्द मोदी के एक मध्यम वर्ग परिवार में 17 सितम्बर 1950 को हुआ था। वे पूर्णतः शाकाहारी हैं। भारत पाकिस्तान के बीच द्वितीय युद्ध के दौरान अपने तरूण काल में उन्होंने स्वेच्छा से रेलवे स्टेशनों पर सफर कर रहे सैनिकों की सेवा की। युवावस्था में वे छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में शामिल हुए और साथ ही साथ भ्रष्टाचार विरोधी नव निर्माण आन्दोलन में हिस्सा लिया। एक पूर्ण कार्यकालिक आयोजक के रूप में कार्य करने के बाद उन्हें भारतीय जनता पार्टी में संगठन का प्रतिनिधि मनोनीत किया गया।
किशोरावस्वथा में अपने भाई के साथ एक चाय की दुकान चला चुके मोदी ने अपनी स्कूली शिक्षा बड़नगर में पूरी की। उन्होंने आर.एस.ए. के प्रचारक रहते हुए 1980 में गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर परीक्षा पास की।
अपने माता पिता की कुल छह सन्तानों में तीसरे पुत्र नरेन्द्र ने बचपन में रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने में अपने पिता का भी हाथ बटाया। बड़नगर के ही एक स्कूल मास्टर के अनुसार नरेन्द्र हालांकि एक औसत दर्जे का छात्र था लेकिन वाद विवाद और नाटक प्रतियोगिताओं में उसकी बेहद रूचि थी। 13वें वर्ष की आयु में नरेन्द्र की सगाई जशोदाबेन चमनसाल के साथ कर दी गई। जब उनका विवाह हुआ तब वे मात्र 17 वर्ष के थे। नरेन्द्र मोदी के जीवनी लेखकों के अनुसार उन दोनों की शादी जरूर हुई परन्तु वे दोनों एक साथ कभी नहीं रहे। शादी के कुछ वर्षों बाद नरेन्द्र ने घर त्याग दिया और एक प्रकास से उनका वैवाहिक जीवन समाप्त सा हो गया।
प्रारम्भिक राजनीति सक्रियता और राजनीति
नरेन्द्र जब विश्वविद्यालय के छात्र थे तभी वे आर.एस.ए. की शाखा में नियमित जाने लगे थे। इस प्रकार उनका जीवन संघ के एक निष्ठावान प्रचारक के रूप में प्रारम्भ हुआ। उन्होंने शुरूआती जीवन से ही राजनीतिक सक्रियता दिखलाई और भारतीय जनता पार्टी का आधार मजबूत करने में प्रमुख भूमिका निभाई।
1995 में राष्ट्रीय मंत्री के नाते उन्हें पाँच प्रमुख राज्यों में पाटीं का संगठन का काम दिया गया जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। 1998 में उन्हें पदोन्नत करके राष्ट्रीय महामंत्री का उत्तरदायित्व दिया गया। भारतीय जनता पार्टी ने अक्टूबर 2001 में केशवभाई पटेल को हटाकर गुजरात की मुख्यमंत्री पद की कमान नरेन्द्र को सौंप दी।
2014 का लोक सभा चुनावः गोआ में भाजपा कार्य समीति द्वारा नरेन्द्र मोदी की 2014 की लोक सभा की चुनाव की कमान सौंपी गई। 13 सितम्बर 2013 को उन्हें लोक सभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया।

परिणामः नरेन्द्र मोदी के नेतृत्त्व में 16वें लोक सभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन 336 सीटें जीत कर सबसे बड़ी संसदीय दल के रूप में उभरे वहीं अकेले भारतीय जनता पार्टी ने 282 सीटें जीतीं। नरेन्द्र मोदी स्वतन्त्र भारत में जन्म लेने वाले ऐसे व्यक्ति हैं जो सन 2001 से 2014 तक लगभग 13 साल गुजरात के 14वें मुख्यमंत्री रहे और हिन्दुस्तान के 15वें प्रधानमंत्री बने।

राष्ट्रीय एकता

राष्ट्रीय एकता
हमारा भारत देश विश्व के मानचित्र पर एक विशाल देश के रूप में चित्रित है। प्राकृतिक रचना के आधार पर तो भारत के कई अलग अलग रूप और भाग हैं। उत्तरी का पर्वतीय भाग, गंगा-यमुना सहित अन्य नदियों का समतलीय भाग, दक्षिण का पठारी भाग और समुन्द्र तटीय मैदान। भारत का एक भाग दूसरे भाग से अलग थलग पड़ा हुआ है। नदियों और पर्वतों के कारण ये भाग एक दूसरे से मिल नहीं पाते हैं। इसी प्रकार से जलवायु की विभिन्नता और अलग अलग क्षेत्रों के निवासियों के जीवन आचरण के कारण भी देश का स्वरूप एक दूसरे से विभिन्न और पृथक पड़ा हुआ दिखाई देता है।
इन विभिन्नताओं के होते हुए भी भारत एक है। भारतवर्ष की निर्माण सीमा ऐतिहासिक है। वह इतिहास की दृष्टि से अभिन्न है। इस विषय में हम जानते हैं कि चन्द्रगुप्त, अशोक, विक्रमादित्य और बाद मुगलों ने भी इस बात की बड़ी कोशिश थी कि किसी तरह सारा देश एक शासक के अधीन लाया जा सके। उन्हें इस कार्य में कुछ सफलता भी मिली थी। इस प्रकार के भारत की एकता ऐतिहासिक दृष्टि से एक ही सिद्ध होती है।
हमारे देश की एकता एक बड़ा आधार दर्शन और साहित्य है। हमारे देश का दर्शन सभी प्रकार की भिन्नताओं और असमानताओं को समाप्त करने वाला है। यह दर्शन है- सर्वसमन्वय की भावना का पोषक। यह दर्शन किसी एक भाषा में नहीं लिखा गया है। अपितु यह देश की विभिन्न भाषाओं में लिखा गया है। इसी प्रकार से हमारे देश का साहित्य विभिन्न क्षेत्र के निवासियों के द्वारा लिखे जाने पर भी क्षेत्रवादिता या प्रान्तीयता के भावों को नहीं उत्पन्न करता है, बल्कि सबके लिए भाईचारे और सद्भाव की कथा सुनाता है। मेल-मिलाप का सन्देश देता हुआ देश भक्तों के भावों को जगाता है। इस प्रकार के साहित्य की लिपि भी पूरे देश की एक ही लिपि है- देवनागरी लिपि। प्रख्यात विचारक कविवर दिनकर जी का इस सम्बन्ध में इसी प्रकार का विचार था-
विचारों की एकता जाति की सबसे बड़ी एकता होती है। अतएव भारतीय जनता की एकता के असली आधार भारतीय दर्शन और साहित्य हैं, जो अनेक भाषाओं में लिखे जाने पर भी अन्त में जाकर एक ही साबित होते हैं। यह भी ध्यान देने की बात है कि फारसी लिपि को छोड़ दें, तो भारत की अन्य सभी लिपियों की वर्णमाला एक ही है। यद्यपि यह अलग अलग लिपियों में लिखी जाती है।
यद्यपि हमारे देश की भाषा एक नहीं अनेक हैं। यहाँ पर लगभग पन्द्रह भाषाएँ हैं। इन सभी भाषाओं को बोलियाँ अर्थात् उपभाषाएँ भी हैं। सभी भाषाओं को सविधान से मान्यता मिली है। इन सभी भाषाओं से रचा हुआ साहित्य हमारी राष्ट्रीय भावनाओं से ही प्रेरित है। इस प्रकार से भाषा भेद की भी ऐसी कोई समस्या नहीं दिखाई देती है, जो हमारी राष्ट्रीय एकता को खंडित कर सके। उत्तर भारत का निवासी दक्षिणी भारत के निवासी की भाषा को न समझने के बावजूद उसके प्रति कोई नफरत की भावना नहीं रखता है। रामायण, महाभारत आदि ग्रन्थ हमारे देश की विभिन्न भाषाओं में तो हैं, लेकिन इनकी व्यक्त हुई भावना हमारी राष्ट्रीयता को ही प्रकाशित करती है। तुलसी, सूर, कबीर, मीरा, नानक, रैदास, तुकाराम, विद्यापति, रवीन्द्रनाथ टैगोर, ललदेव, तिरूवल्लुवर आदि की रचनाएँ एक दूसरी की भाषा से नहीं मिलती है। फिर भी इनकी भावात्मक एकता राष्ट्र के सांस्कृतिक मानस को ही पल्लवित करने में लगी हुई है।
हमारे देश की परम्पराएँ, मान्यताएँ, आस्थाएँ जीवन मूल्य सभी कुछ हमारी राष्ट्रीयता के ही पोषक हैं। पर्व-तिथि-त्योहार की मान्यताएँ यद्यपि अलग अलग हैं, फिर भी सबसे एकता और सर्वसमन्वय का ही भाव प्रकट होता है। यही कारण है कि एक जाति के लोग दूसरी जाति के तिथि पर्व त्योहारों में शरीक होकर आत्मीयता की भावना को प्रदर्शित करते हैं। धर्म के प्रति आस्था ओर विश्वास की भावना हमारी जातीय वर्ग को प्रकट करते हैं। अतएव धर्मों के मूल में कोई भेछ नहीं है।  यही कारण है कि हमारे देश में न केवल राष्ट्रयीता के पोषक विभिन्न प्रकार के धर्मों को अपनाने की पूरी छूट हमारे संविधान ने दे दी है, अपितु संविधान की इस छूट के कारण ही भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की संज्ञा भी दे दी। इसका यह भी अर्थ है कि यहाँ का कोई धर्म किसी दूसरे धर्म में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।
भारत की एकता की सबसे बड़ी बाधा थी- ऊँचे-ऊँचे पर्वत, बड़ी-बड़ी नदियां, देश का विशाल क्षेत्रफल आदि। जनता इन्हें पार करने में असफल हो जाती थी। इससे एक दूसरे से सम्पर्क नहीं कर पाते थे। आज की वैज्ञानिक सुविधाओं के कारण अब यह बाधा समाप्त हो गई है। देश के सभी भाग एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इस प्रकार हमारी एकता बनी हुई है।
हमारे देश की एकता का सबसे बड़ा आधार प्रशासन की एकसूत्रता है। हमारे देश का प्रशासन एक है। हमारा संविधान एक है और हम दिल्ली में बैठे बैठे ही पूरे देश पर शासन करने में समर्थ हैं।


राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा)

राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा)
प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र का अपना एक चिन्ह या प्रतीक होता है। जिससे उसकी पहचान बनती है। राष्ट्रीय ध्वज हर राष्ट्र के गौरव का प्रतीक होता है।
तिरंगाहमारा राष्ट्रीय ध्वज है। हमारा देश भारत विविध जातियों, धर्मों और संस्कृतियों को देश है। इसी प्रकार हमारा ध्वज भी भाव प्रधान है। हमारे राष्ट्र के झंडे में तीन रंग हैं इसीलिये इसे तिरंगा कहते हैं। झंडे में तीन रंगों की पट्टियाँ हैं। जिनका आकार समान है। झंडे के सबसे ऊपर केसरिया रंग है जो वीरता और शौर्य को प्रकट करता है। बीच का हिस्सा सफेद रंग हा है जो पवित्रता, त्याग भावना एवं सादगी का प्रतीक है। नीचे के भाग का हरा रंग हमारे देश की हरी भरी धरती और सम्पन्नता को दर्शाता है। ध्वज की मध्य सफेद पट्टी पर अशोक चक्र बना है। नीले रंग के अशोक चक्र में 24 लाइनें हैं। अशोक चक्र धर्म, विजय एवं प्रगति का द्योतक है।
हमारी स्वतंत्रता की लड़ाई में तिरंगे की एक मुख्य भूमिका रही। 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद यह हमारा राष्ट्रीय ध्वज बना। राष्ट्रीय समारोहों एवं महत्वपूर्ण अवसरों पर एक राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है।
राष्ट्रीय ध्वज प्रत्येक राष्ट्र की शान होता है। राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। राष्ट्रीय ध्वज का अपमान दण्डनीय अपराध है।

लहराता हुआ तिरंगा प्रत्येक भारतीय को राष्ट्र प्रेम की भावना से ओत प्रोत कर देता है।

विद्यालय का वार्षिकोत्सव

विद्यालय का वार्षिकोत्सव
विद्यालय का वार्षिकोत्सव का अर्थ है- एक साल के अंत में होने वाला उत्सव। प्रत्येक विद्यालय का वार्षिक उत्सव होता है। इस अवसर पर विशेष समारोह किए जाते हैं और इस समारोह में विद्यालय के सभी सदस्य सामान्य या प्रमुख रूप से भाग लिया करते हैं। इसलिए इस उत्सव का विशेष महत्व होता है-
प्रत्येक विद्यालय की तरह हमारे विद्यालय का भी वार्षिकोत्सव प्रतिवर्ष बसंत पंचमी के शुभावसर पर सम्पन्न किया जाता है। इस उत्सव के लिए विशेष प्रबन्ध और आयोजन किए जाते हैं। इसकी तैयारियाँ महीनों पूर्व ही होने लगती हैं। इसमें सभी अध्यापक, छात्र, कर्मचारी सक्रिय रूप से भाग लिया करते हैं। प्रधानाचार्य की भूमिका बहुत बड़ी होती है। वे इस कार्य को सम्पन्न कराने के लिए पुरजोर प्रयास किया करते हैं। न केवल विद्यालय की ही तैयारी करवानें में वे लगे रहते हैं, अपितु इससे सम्बन्धित बाहर की भी तैयारियों में विशेष रूचि और भाव प्रकट करते हैं। इसलिए हमारे विद्यालय का यह वार्षिकोत्सव एक विशेष आयोजन और समारोह के साथ प्रतिवर्ष सम्पन्न हुआ करता है।
प्रतिवर्ष की भाँति इस वर्ष भी बसंत पंचमी के शुभदिन हमारे विद्यालय का वार्षिकोत्सव सम्पन्न करने के लिए बड़ी धूमधाम और जोर शोर के साथ तैयारियाँ होने लगीं। हमारे प्रधानाचार्य जी ने अपनी रूचि और क्षमता का परिचय आरम्भ से देना ही शुरू कर दिया था। इस समारोह में आयोजित कार्यक्रमों की सूची एक माह पूर्व ही संचालक महोदय ने जारी कर दी थी जिसके परिणामस्वरूप इसमें भाग लेने के इच्छुक पात्रों ने अपनी अलग अलग तैयारियाँ भी आरम्भ कर दी थी।
इस क्रायकर्म के मुख्य आकर्षक थे- नाटक, कविता, वाद-विवाद और खेल कूद। सभी पात्रों ने इसमें भाग लेना आरम्भ कर दिया था। संचालक महोदय ने सबकी योग्यता की पहचान करके सबकों अलग अलग विषय दे दिया था। दूसरी और इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए दूर दूर से महान पुरूषों, जिनमें कुछ तो उच्च पदाधिकारी थे और कुछ बहुत बड़े सामाजिक व्यक्ति और सभ्रांत पुरूष भी थे, आमन्त्रित किये गये। विद्यार्थियों के परिवार के प्रमुख सदस्यों को भी इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। इससे विद्यालय के विद्यार्थियों में एक बड़ी खुशी की लहर उट रही थी और उनके साथियों को इससे कहीं और ही अधिक प्रसन्नता थी।
बड़ी प्रतीक्षा के बाद विद्यालय के वार्षिकोत्सव का वह शुभदिन बसंत पंचमी आ गयी। इस दिन सभी आमंत्रित और सम्बन्धित व्यक्ति एक एक करके विद्यालय के प्रमुख द्वार से अन्दर प्रवेश कर रहे थे। विद्यालय के इस प्रमुख द्वार के दोनों दी ओर दो वरिष्ठ अध्यापक अतिथियों के सम्मानपूर्वक स्वागत कार्य में लगे थे। विद्यालय के विशाल प्रांगण में एक बड़ा मंच बना हुआ था। आस पास कई कुर्सियां थीं, जो अभी तक रिक्त थीं। धीरे धीरे विद्यालय के सदस्य इस मंच के चौड़ी और पंक्तिबद्ध कुर्सियों पर आसन ग्रहण करते गए। विद्यालय के सभी विद्यार्थी और अन्य कर्मचारी गण भी यथा स्थान बैठ गए थे। जब प्रधानाचार्य के अपने लाउड हेलर से सबको यथा स्थान बैठ जाने पर निर्देश दिया तब जो अभी तक खड़े खड़े इस भव्य दृष्य का दर्शन कर रहे थे, वे भी यथास्थान बैठ गए।
वार्षिकोत्सव का कार्यक्रम दिन के 10 बजे के समय से संचालक महोदय के सूचनाबद्ध सम्भाषण से आरम्भ हुआ। इसके बाद विद्यालय के वरिष्ठ अध्यापक के संक्षिप्त सूचनाबद्ध और कार्यक्रम के महत्व तथा विद्यालय के विशेष महत्व को रेखांकित करने के सम्भाषण से कुछ देर तक कार्यक्रम चला। इसके बाद विद्यालय के प्रधानाचार्य ने अतिथियों के प्रति आभार प्रकट करते हुए उनके आगमन के प्रति अपनी खुशी भी प्रकट की। इसके बाद प्रधानाचार्य ने मुख्य अतिथि प्रदेश के शिक्षामंत्री के प्रति अपना हार्दिक आभार प्रकट करते हुए उन्हें अपने सम्भाषण से सबको कुछ ज्ञान लाभ प्रदान करने का आग्रह किया।
प्रधानाचार्य के कथनानुसार शिक्षामंत्री ने शिक्षा के महत्व पर एक लम्बा व्याखान देते हुए विद्यालय की प्रगति के लिए एक विशेष अनुदान देने की घोषणा भी कर दी। इसे सुनकर कई बार तालियों की गड़गड़ाहट होने से पूरा मंच गूँज उठा था। बाद में प्रधानाचार्य ने विद्यालय की प्रगति की रूप रेखा प्रस्तुत की। अंत में शिक्षामंत्री के कर कमलों द्वारा कार्यक्रमों में भाग लेने वाले उत्तीर्ण और यौग्य पात्रों को पुरस्कार भी प्रदान किया गया। अन्त में संचालक महोदय ने धन्यवाद प्रकाशन करते हुए इस समारोह की समाप्ति की घोषणा कर दी थी। सबसे अंत में मिष्ठान वितरण हुआ।
घर लौटते हुए सबके मुंह से विद्यालय की प्रगति की बातें बार बार निकल रही थी। सभी विद्यालय के इस वार्षिक समारोह से संतुष्ट और प्रसन्न थे। दूसरे दिन समाचार पत्रों ने भी इस समारोह के आयोजन और कार्यक्रमों की सम्पन्नता को विस्तारपूर्वक प्रकाशित किया। इसे पढ़ पढ़कर सभी हमारे विद्यालय के महत्व को बार बार कह सुन रहे थे।


साम्प्रदायिकता

                                  साम्प्रदायिकता 
प्रस्तावना- सम्प्रदाय का अर्थ है विशेष रूप से देने योग्य, सामान्य रूप से नहीं अर्थात् हिन्दूमतावलम्बी के घर में जन्म लेने वाले बालक को हिन्दू धर्म की ही शिक्षा मिल सकती है, दूसरे को नहीं। इस प्रकार से साम्प्रदायिकता का अर्थ हुआ एक पन्थ, एक मत, एक धर्म या एक वाद। न केवल हमारा देश ही अपितु विश्व के अनेक देश भी साम्प्रदायिक हैं। अतः वहां भी साम्प्रदायिक हैं। अतः वहाँ भी साम्प्रदायिकता है। इस प्रकार साम्प्रदायिकता का विश्व व्यापी रूप है। इस तरह यह विश्व चर्चित और प्रभावित है।
साम्प्रदायिकता के दुष्परिणामसाम्प्रदायिकता के अर्थ आज बुरे हो गए हैं। इससे आज चारों और भेदभाव, नफरत और कटुता का जहर फैलता जा रहा है। साम्प्रदायिकता से प्रभावित व्यक्ति, समाज और राष्ट्र एक-दूसरे के प्रति असद्भावों को पहुँचाता है। धर्म और धर्म नीति जब मदान्धता को पुन लेती है। तब वहाँ साम्प्रदायिकता उत्पन्न हो जाती है। उस समय धर्म-धर्म नहीं रह जाता है वह तो काल का रूप धारण करके मानवता को ही समाप्त करने पर तुल जाता है। फिर नैतिकता, शिष्टता, उदारता, सरलता, सहदयता आदि सात्विक और दैवीय गुणों और प्रभावों को कहीं शरण नहीं मिलती है। सत्कर्त्तव्य जैसे निरीह बनकर किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाता है। परस्पर सम्बन्ध कितने गलत और कितने नारकीय बन जाते हैं। इसकी कहीं कुछ न सीमा रह जाती है और न कोई अुनमान। बलात्कार, हत्या, अनाचार, दुराचार आदि पाश्विक दुष्प्रवृत्तियाँ हुँकारने लगती हैं। परिणामस्वरूप मानवता का कहीं कोई चिन्ह नहीं रह जाता है।
इतिहास साक्षी है कि साम्प्रदायिकता की भयंकरता के फलस्वरूप ही अनेकानेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्ररीय स्तर पर भीषण रक्तपात हुआ है। अनेक राज्यों और जातियों का पतन हुआ है। अनेक देश साम्प्रदायिकता के कारण ही पराधीनता की बेडि़यों में जकड़े गए हैं। अनेक देशों का विभाजन भी साम्प्रदायिकता के फैलते हुए जहर-पान से ही हुआ है।
साम्प्रदायिकता का वर्तमान स्वरूपआज केवल भारत में ही नहीं अपितु सारे विश्व में साम्प्रदायिकता का जहरीला साँप फुँफकार रहा है। हर जगह इसी कारण आतंकवाद ने जन्म लिया है। इससे कहीं हिन्दू-मुसलमान में तो कहीं सिक्खों-हिन्दुाओं या अन्य जातियों में दंगे फसाद बढ़ते ही जा रहे हैं। ऐसा इसलिए आज विश्व में प्रायः सभी जातियों और धर्मों ने साम्प्रदायिकता का मार्ग अपना लिया है। इसके पीछे कुछ स्वार्थी और विदेशी तत्व शक्तिशाली रूप से काम कर रहे हैं।

उपसंहारसाम्प्रदायिकता मानवता के नाम पर कलंक है। यदि इस पर यथाशीघ्र विजय नहीं पाई गई तो यह किसी को भी समाप्त करने से बाज नहीं आएगा। साम्प्रदायिकता का जहर कभी उतरता नहीं है। अतएव हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए कि यह कहीं किसी तरह से फैले ही नहीं। हमें ऐसे भाव पैदा करने चाहिएं जो इसको कुचल सकें। हमें ऐसे भाव पैदा करना चाहिएं-
मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना।
हिन्दी है हम वतन है, हिन्दोस्ता हमारा।
तथा
चाहे जो हो धर्म तुम्हारा, चाहे जो भी वादी हो,
नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो तुम अपराधी हो।


हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कवि: तुलसीदास अथवा मेरा प्रिय कवि: तुलसीदास पर निबंध

हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कवि: तुलसीदास अथवा मेरा प्रिय कवि: तुलसीदास पर निबंध

भारतवर्ष में समय-समय पर धर्म, विज्ञान एवं साहित्य आदि क्षेत्र में महान विद्‌वानों व साहित्यकारों ने जन्म लिया है । ये भारतीय इतिहास का गौरव रहे हैं और इन पर भारत सदैव गौरवान्वित रहेगा ।
जायसी, सूर, तुलसी, भारतेंदु, हरिश्चंद, दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त, महान उपन्यासकार प्रेमचंद आदि देश के महान कवियों एवं साहित्यकारों में गिने जाते हैं । इनमें कविवर तुलसीदास मुझे सर्वश्रेष्ठ कवि लगते हैं क्योंकि भगवान श्रीराम के शील, सौंदर्य व भक्ति का जो समन्वित तथा सगुण रूप तुलसीदास ने प्रस्तुत किया है वह अद्‌वितीय है ।
युग-युगांतर तक उनकी यह काव्यमयी वाणी भारतभूमि पर अमृत वर्षा करती रहेगी और लोगों के धार्मिक एवं सामाजिक जीवन में नई जागृति व स्कूर्ति का संचार करती रहेगी । तुलसीदास जी भक्तिकाल की राम-भक्ति शाखा के प्रमुख कवि हैं । इनका जन्म 1532 ई॰ में उत्तर प्रदेश के एटा जिले के सोरो ग्राम में हुआ था ।
इनकी माता का नाम हुलसी तथा पिता का नाम आत्माराम दुबे था । इनका लालन-पालन एक दासी के द्‌वारा हुआ क्योंकि अयुक्तमूल नक्षत्र में पैदा होने के कारण बचपन से ही उनके माता-पिता ने तुलसी का परित्याग कर दिया था । बचपन में मुख से राम निकलने के कारण इनका नाम राम बोलारखा गया था ।
तुलसी को शिक्षा-दीक्षा बाबा नरहरिदास से मिली । 15 वर्ष तक वेदांत का अध्ययन करने के उपरांत उनका विवाह रत्नावली नामक रूपवती कन्या से हुआ । पत्नी प्रेम में मोहित तुलसी को एक पल का विरह अखरता था ।
कालातर में पत्नी के कठोर वचनों से ही उनमें वैराग्य उत्पन्न हुआ । इसके बाद ही उन्हें राममें आसक्ति हुई और फिर शेष जीवन काशी, अयोध्या और चित्रकूट में व्यतीत हुआ । सन् 1623 ई॰ में रामकी अनन्य भक्ति में लीन तुलसी अमरत्व को प्राप्त हो गए ।
इनकी मृत्यु के संदर्भ में निम्नलिखित दोहा प्रसिद् है:
सवंत सोलह सौ असी, असी गंग के तीर  श्रावण शुक्ल सप्तमी, तुलसी तज्योशरीर 
काव्य की दृष्टि से तुलसीदास जी के काव्य में भाव एवं कला दोनों ही पक्ष अत्यंत उच्च कोटि के हैं । अन्य रसों के साथ ही साथ भक्तिरस की जो अद्‌भुत धारा तुलसी के काव्य में देखने को मिलती है वह अद्‌वितीय है । इसके अतिरिक्त इनके काव्य में वस्तु-विन्यास, दार्शनिकता, नारी-भावना, प्रकृति-चित्रण, लोक-मर्यादा, बौद्‌धिकता आदि का बड़ा ही सुंदर समन्वय देखने को मिलता है । तुलसी की रचनाओं में भक्ति दास्य भाव प्रधान है ।
उन्होंने अपने आराध्य की महानता को शिखर पर देखा है तथा स्वयं को अतिदीनहीन और अति तुच्छ भक्त माना है: राम सौ बड़ो है कौन, मोसौ कौन छोटो 
तुलसी के काव्य में अद्‌भुत लालित्य व माधुर्य देखने को मिलता है । इसके अतिरिक्त कर्म और ज्ञान की जो धारा इनके वाक्य में दृष्टिगोचर होती है वह अलौकिक तथा समस्त प्राणियों का दु:ख-संताप हरने वाली है । तुलसीदास जी के काव्य में भाव पक्ष के साथ ही साथ कला पक्ष अत्यंत सुदृढ़ व सुसंगठित है ।
इसमें अलंकारों, छंदों व संवादों आदि का अद्‌भुत सम्मिश्रण है । इनकी भाषा-शैली, वस्तु-वर्णन आदि उच्चकोटि का है । तुलसीदास जी की रचनाओं में अवधी तथा ब्रजभाषा का बाहुल्य देखने को मिलता है । गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य जगत के उन जगमगाते नक्षत्रों में से एक हैं जिनके साहित्य ज्ञान का प्रकाश युग-युगांतर तक जनमानस को अंधकार (पाप) से मुक्ति दिलाता रहेगा ।
उनके साहित्य के महत्व का मूल्यांकन करते हुए किसी कवि ने लिखा है:
सूर सूर तुलसी ससि उडुगन केशवदास  अब के कवि खद्योत सम जहँ तहँकरत प्रकास ।।
तुलसीदास मूलत: भक्तियुग की सगुण धारा के कवि थे परंतु उनके काव्य में निर्गुण-सगुण दोनों का ही समन्वय देखने को मिलता है । इसके साथ ही साथ ज्ञान और भक्ति, भाव-भाषा और शैली, छंद-अलंकार आदि का उनके काव्य में महान समन्वय उन्हें लोकनायक के पद पर विराजमान करता है । वे सच्चे अर्थों में साहित्य जगत के सर्वश्रेष्ठ कवियों में से एक थे ।
कवि हरिऔध जी ने सत्य ही लिखा है:
कविता करके तुलसी  लसे, कविता लसी पा तुलसी की कला 
सचमुच तुलसीदास अपनी भक्ति के अतिरिक्त अपने ज्ञान, अपनी दक्षता के मामले में भी अद्‌वितीय कहे जा सकते हैं । आज तक हिंदी साहित्य जगत् में उनकी जोड़ का दूसरा कवि नहीं हुआ जो पूरे हिंदुस्तान में इतना प्रभाव अपने साहित्य के माध्यम से छोड़ पाया हो । लोग अपने दैनिक जीवन की समस्याओं का निराकरण उनकी कविताओं के माध्यम से हर युग में करते रहेंगे ।