Tuesday, 18 March 2014

आर्थिक उदारवाद का भविष्य






Thursday, 27 February 2014

दीपावली

दीपावली
दीपावली दीपों का त्योहार है। प्रतिवर्ष पूरे भारत सहित विश्व को कोने-कोने में हिन्दू धर्मावलम्बियों द्वारा इस पर्व को पूरे हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है। इस त्योहार का हिन्दू धर्म में अत्यंत महत्व है। इसे प्रकाश का त्योहार भी कहा जाता है। प्रतिवर्ष आश्विन मास की अमावश्या को दीप जलाकर और पटाखे छोड़ कर इसका आनंद लेते हैं।
दीपावली क्यों मनाया हटा है इसके पीछे अनेक पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। इनमें से एक प्रसिद्ध कथा है की जब भगवान राम, रावण के वध के पश्चात अयोध्या लौटे तो वो दिन अमावश्या का था। अतः लोगों ने अपने प्रिय राम के स्वागत और अंधेरे को दूर भागने के लिए पूरे अयोध्या को दीपों से प्रज्वलित कर दिया था। अतः ये प्रथा तब से चलने लगी। एक अन्य मान्यता के अनुसार इसी दिन धन और संपन्नता की देवी लक्ष्मी, राजा बाली के चंगुल से आजाद हुई थी। चंद कलेंडर के अनुसार इस दिन को हिन्दू कलेंडर की प्रारम्भिक तिथि अर्थात पहली तारीख भी मानी जाती है। अतः लोग इन मान्यताओं के अनुसार पूरे हर्षोउल्लास के साथ देश-विदेश के विभिन्न भागों में दीपावली मानते हैं।
दीपावली के आने से कुछ दिनों पूर्व से ही लोग अपने घरों की साफ सफाई और रंग रोगन के कार्य में लग जाते हैं। इसके पश्चात लोग घरों पर विभिन्न प्रकार के बल्ब और रंगीन बल्ब से अपने घर बाहर सजाते हैं। घरों में रंगोलियां बनाई जाती है। अनेक प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं। हर घर में गणेश-लक्ष्मी की प्रतिमा बिठाई जाती है। फूलों से घरों के प्रवेश द्वार को सजाया जाता है। दुकानदार अपने-अपने दुकानों में भी पूजन करते हैं। लोगों द्वारा सहर्ष जुआ खेला जाता है। घरों को दिये जलाकर प्रकाशित किया जाता है। बच्चे-बूढ़े सभी पटाखे छोड़ते हैं। पूरा दिन और रात सुहावना होता है।
वैसे तो दीपावली जब भी आती है लोगों में उत्सुकता और अपने घरों को नए रूप में सजाने की बेचैनी सहज ही देखी जा सकती है, लेकिन हर वर्ष देश के विभिन्न भागों में कोई न कोई दुर्घटना जरूर हो जाती है। लोगो की नासमझी और सही तरीके से पटाखे नहीं छोड़ने के कारण कई लोग पटाखों से घायल हो जाते हैं। कई बार तो खलिहान, घरों और दुकानों में पटाखों से आग लग जाती है। बच्चों को तो सबसे अधिक खतरा होता है। पटाखों के अत्यधिक प्रयोग से वातावरण भी प्रदूषित हो जाता है।
अतः हमें पर्यावरण के अनुकूल सामग्रियों से ही इस रोचक पर्व का आनंद लेना चाहिए। पटाखों के प्रयोग के समय सावधानी बरतना चाहिए। जब भी बच्चे पटाखों का प्रयोग करें, साथ में बड़े लोगों को उनका मार्गदर्शन करना चाहिए। हमें दिये, बत्ती और मिठाइयों के साथ जहां तक संभव हो इस पर्व को मनाने चाहिए।

शब्द संख्या: 322 शब्द। 

Thursday, 30 January 2014

श्री सुभाश चन्द्र बोस ‘‘एक करिश्माई व्यक्तित्व’’

श्री सुभाश चन्द्र बोस ‘‘एक करिश्माई व्यक्तित्व’’

सुभाश चन्द्र बोस भारत के महान देषभक्त थे। भारत के स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत सेनानियों में जब भी गिनती की जाएगी, इन्हें सर्वोच्च स्थान प्राप्त होगा। अद्भुत देषप्रेम एवं निश्ठा के कारण समस्त विष्व में आज भी इन्हें बड़े सम्मान के साथ याद किया जाता है। भारतवासियों को ब्रिटिष षाशकों के खिलाफ उनकी षक्ति का अहसास सर्वप्रथम इनके ही नेतृत्व में हुआ था।

सुभाश चन्द्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 ई0 को उड़ीसा राज्य के कटक नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता वहाॅं के एक प्रसिद्ध वकील थे। वे बचपन से ही एक मेघावी छात्र थे। इन्होंने दर्षनषास्त्र में प्रथम श्रेणी में प्रतिश्ठा के साथ बी0ए0 की परीक्षा उत्तीर्ण की। उच्च षिक्षा हेतु वे इंग्लैंड गए। वहाॅं उन्होंने सिविल सर्विसेस की परीक्षा योग्यतापूर्वक पास की और प्रथम स्थान प्राप्त किया। लेकिन भारत में ब्रिटिष सरकार की नीतियों से आहत होकर देषसेवा और राजनीति के लिए खुद को समर्पित कर दिया । अतः वे कांग्रेस में षामिल हो गए। उन्हें कलकत्ता काॅरपोरेषन का मेयर नियुक्त किया गया। आगे जाकर उन्होंने अपने व्यक्तित्व से समस्त कांग्रेस पर अमिट प्रभाव छोड़ा, जिससे वे कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित किए गए। परन्तु गाॅंधीजी से वैचारिक मतभेद होने के कारण उन्होंने अध्यक्ष पद से षीघ्र ही इस्तीफा दे दिया। उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसा से अधिक हिंसापूर्वक आजादी प्राप्त कर लेने में विष्वास था, अतः उन्होंने फारवर्ड ब्लाॅक नामक पार्टी का गठन किया।

ब्रिटिष षासन सुभाश चंद्र बोस के कार्यों से भयभीत होने लगी थी। इस कारण इन्होंने सुभाश चंद्र जी को उनको घर पर ही नजरबन्द कर दिया, लेकिन सुभाश अंग्रेजों के आॅंखों में धूल झोंकने में कामयाब हुए और वहाॅं से भागकर अफगानिस्तान के रास्ते जर्मनी पहॅंुचे। जर्मनी में हिटलर उनसे मिलकर बहुत प्रभावित हुए और ब्रिटिष षासन के खिलाफ युद्ध में हर संभव मदद का आष्वासन दिया। इनकी और जापान की सेना की मदद से सुभाश चंद्र बोस जी ने वहाॅं आजाद हिन्द फौज जिनका गठन रासबिहारी बोस ने किया था को मजबूत किया और हजारों भारतीयों को अपनी सेना में नियुक्त किया। इस सेना का एक ही उद्देष्य था जान गॅंवाकर भी भारत की भूमि से अंग्रेजों को निकाल बाहर करना। सुभाश चंद्र बोस ने अपने सेना को नारा दिया ‘‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूॅंगा’’ और ‘‘दिल्ली चलो’’।

इनके नेतृत्व में एक विषाल फौज मयनमार के रास्ते ब्रिटिष फौज को रौंदते हुए अरूणाचल प्रदेष होते हुए मणिपुर के इम्फाल तक पहुॅंच चुकी थी। श्री बोस के इस साहसिक कदम से सम्पूर्ण ब्रिटिष षासन काॅंपने लगा था और भारत से पलायन के लिए तैयार होने लगा था, लेकिन इसी बीच श्री बोस का विमान सन् 1945 ई0 को दुर्घटनाग्रस्त हो गया और वे लापता हो गए साथ ही जापान सहित जर्मनी की पराजय ने आजाद हिन्द फौज के कदम को विफल कर दिया। इस प्रकार एक इतिहास होते होते रह गया। उस दिन के बाद से श्री बोस को अलग-अलग जगह में देखे जाने की बात कही गई, लेकिन वे आज भी लापता हैं।

श्री सुभाश चन्द्र बोस ने अपने कार्यों से अंग्रेजों समेत समस्त विष्व को अपना लोहा मनवाया था। उनके ओजस्वी व्यक्तित्व, प्रभावषाली भाशण और अद्भुत देषप्रेम की आज भी मिसाल दी जाती है। अनगिनत देषप्रेमियों के वे आदर्ष रहे हैं। आज के युवाओं को उनसे प्रेरणा ग्रहण कर स्वयं को बदलना चाहिए।


पराधीन सपनेहूं सुख नाहीं


स्वाधीनता हर मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। इसको पाने के लिए यदि मनुष्य को लड़ना भी पड़े तो सदैव तत्पर रहना चाहिए। पराधीनता वो अभिशाप है जो मनुष्य के आचार.व्यवहारए उसके परिवेशए समाजए मातृभूमि और देश को गुलाम बना देते हैंए फिर चाहे तो कैसी भी गुलामी रही हो। पिंजरे में बंद पक्षी से अधिक आजादी और स्वच्छंदता का महत्व कौन समझ सकता है ?



भारत ने बहुत लंबे समय से गुलामी के शाप को सहा है। पहले वो मुगलों के अधीन रहा। उनके द्वारा उसने अनेकों अत्याचार सहे परन्तु उसकी नींव नहीं हिली। इसका मुख्य कारण था श्मुगलश् पहले आए तो लूटमार के मकसद से थे परन्तु धीरे.धीरे उन्होंने यहाँ रहना स्वीकार कर इस पर राज किया। यदि शुरु के मुगलकाल को अनदेखा कर दिया जाए तो बाकि मुस्लिम शासकों ने यहाँ की धन.संपदा का शोषण नहीं किया वो यहाँ अपना शासन चाहते थे पर लूटकर बाहर नहीं ले जाना चाहते थे। मुगलकाल के खत्म होते.होते अंग्रेज़ों ने यहाँ अपने पैर पसारने शुरु किए। पहले.पहल उन्होंने इसे व्यापार के लिए चुना परन्तु उनका उद्देश्य बहुत बाद में समझ में आया। व्यापार करते हुए उन्होंने पूरे भारत को अपने हाथों में समेटना शुरु कर दिया। उनका उद्देश्य यहाँ की अतुल धन.संपदा का शोषण कर उसे अपने देश पहुँचाने का था। उन्होंने ऐसा किया भी। भारत का विकास व उन्नति उनका उद्देश्य कभी था ही नहीं।



भारत के लोगों को जब स्थिति समझ में आई तब तक बात हाथ से निकल चुकी थी। पूरा भारत गुलामी की बेड़ियों में बंध चुका था। यहाँ के लोग उनके शोषण से पीड़ित होने लगे थे। उन्होंने यहाँ कि धन.संपदाए संस्कृतिए धरोहर पर अतुल्य वार किए जिसकी छाप आज भी देखी जा सकती है। हम भारतीयों को पराधीनता की बेड़ियाँ तोड़ते आधा दशक लग गया। लोगों ने स्वतंत्रता का मूल्य पहचानना शुरु किया और अंग्रेज़ों द्वारा भयंकर यातनाएँ सही। अनेक देशभक्तों ने काल कोठरियों में अपना जीवन व्यतीत किया। कई वीरों ने हँसते.हँसते अपने प्राणों का बलिदान दिया। अतः हमें किसी भी कीमत पर अपनी आजादी को नहीं खोने देना चाहिए



महंगाईः एक समस्या


महंगाईः एक समस्या

 महंगाई आज हर किसी के मुख पर चर्चा का विषय बन चुका है। विश्व  का हर देश इस से ग्रसित होता जा रहा है। भारत जैसे विकासशील राष्ट्रों  के लिए तो यह चिंता का विषय बनता जा रहा है।

 महंगाई ने आम जनता का जीवन अत्यन्त दुष्कर  कर दिया है। आज दैनिक उपभोग की वस्तुएं  हों अथवा रिहायशी वस्तुएँ , हर वस्तु की कीमत दिन-व-दिन बढ़ती और पहुँच  से दूर होती जा रही है। महंगाई के कारण हम अपने दैनिक उपभोग की वस्तुओं में कटौती करने को विवश होते जा रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक जहाँ  साग-सब्जियाँ  कुछ रूपयों में हो जाती थीं, आज उसके लिए लोगों को सैकड़ों रूपये चुकाने पड़ रहे हैं।

 वेतनभोगियों के लिए तो यह अभिशाप की तरह है। महंगाई की तुलना में वेतन नहीं बढ़ने से वेतन और खर्च में सामंजस्य स्थापित नहीं हो पा रहा है। ऐसे में सरकार को हस्तक्षेप करके कीमतों पर नियंत्रण रखने के दूरगामी उपाय करना चाहिए। सरकार को महंगाई के उन्मूलन हेतु गहन अध्ययन करना चाहिए और ऐसे उपाय करना चाहिए ताकि महंगाई डायन किसी को न सताए।

 महंगाई के लिए तेजी से बढ़ती जनसंख्या, सरकार द्वारा लगाए जाने वाले अनावश्यक कर तथा माँग ग की तुलना में आपूर्ति की कमी है। बेहतर बाजार व्यवस्था से कुछ हद तक मुक्ति मिलेगी। पेट्रोलियम  उत्पाद, माल भाड़ा, बिजली आदि जैसी  मूलभूत विषयों पर जब-तब बढ़ोतरी नहीं करना चाहिए। इन में वृद्धि का विपरित प्रभाव हर वस्तु के मूल्य पर पड़ता है। सरकार की चपलता ही महंगाई को नियंत्रित कर सकती है।

Friday, 10 January 2014

यदि मैं मुख्यमंत्री होता/होती


यदि मैं मुख्यमंत्री होता/होती

वैसे तो मुझे राजनीति बिलकुल पसंद नहीं है लेकिन आज के परिप्रेक्षय में मैं अपने प्रदेश का मुख्यमंत्री बनकर अपने राज्य के लिए बहुत कुछ करना चाहता हूँ। मैं झारखंड जैसे खनन और प्राकृतिक धन-सम्पदा से परिपूर्ण राज्य का निवासी हूँ और ऐसे में अपने प्रदेश को पिछड़ा हुआ देखकर बहुत ही निराश हो जाता हूँ। अतः मैं मुख्यमंत्री बनना चाहता हूँ।

 

मैं मुख्य मंत्री ही इसलिए बनना चाहता हूँ क्यूंकि मुझे लगता है कि मैं एक योग्य मुख्यमंत्री बनकर इस राज्य के विकास के लिए बहुत कुछ करने में सक्षम हूँ। जैसा कि किसी मुख्यमंत्री पर पूरे राज्य के विकास कि जिम्मेवारी होती है मैं इस जिम्मेवारी को अपने तरीके से निभाना चाहता हूँ। आज हमारे राज्य के मंत्री जनता के पैसे को जनता पर खर्च करने के बजाय अपने विकास पर खर्च कर रहे हैं। अतः मुख्यमंत्री बनने के पश्चात मेरी पहली प्राथमिकता यही होगी कि भ्रष्टाचार को यथासंभव जड़ से मिटाने का प्रयास करूँ। किसी भी प्रदेश का विकास तबतक रेंगने पर विवश रहेगा जबतक भ्रस्ट लोगों पर अंकुश नहीं लगाया जाएगा।

 

मैं हर सरकारी और गैर सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचारियों के खिलाफ शिकायत के लिए कुछ फोन नंबर और एक-एक बक्से लगवा दूंगा जिससे जब भी लोगों को किसी भी प्रकार कि शिकायत होगी वे सीधे फोन पर या पत्र के माध्यम से अपनी शिकायतें मुझ तक पहुंचा सकेंगे। जो लोग दोषी पाये जाएंगे उन्हें या तो नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा या तो साथ ही कड़ी से कड़ी सजा का पात्र होना पड़ेगा। इसके पश्चात मैं विकास से जुड़े विषय जैसे सड़क, बिजली, पानी और रोजगार इन सारे विषयों को खुद अपने निगरानी में देखुंगा। मेरी यह पूरी कोशिश होगी की विकास से जुड़े कार्यों को निर्धारित समय में पूरा करूँ। समय-समय बिना किसी विभाग को सूचना दिये हुए, पर पूरे प्रदेश का दौरा करूंगा जिससे विकास की गति की वाशतविकता का ज्ञान हो पाएगा। मैं राज्य मैं उद्योग धंधों के विकास के लिए उचित प्रारूप तैयार करूंगा और स्वयं उसकी निगरानी करूंगा। इससे प्रदेश में रोजगार के नए-नए विकल्प सामने आएंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वम रोजगार को बढ़ावा दूंगा। सरकारी शिक्षण संस्थानों को इतना उन्नत और सुविधासंपन्न बना दूँगा की लोग अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजने के बजाय सरकारी स्कूलों में पूरे गर्व के साथ भेजेंगे और सरकारी स्कूलों के प्रति हीन भावना खत्म होगी।

 

प्रदेश के लोगों से साक्षात अथवा सैटिलाइट के माध्यम से हर सप्ताह रु-बरु होऊंगा। प्रत्येक महीने जनमत संग्रह करूंगा जिससे ये पता लगाया जा सकेगा की विकास और लोगों की समस्या का निराकरण किस हद तक हो पाया है। मैं योग्य लोगों से समय-समय पर सलाह लूँगा जिससे प्रदेश के विकास को आगे बढ़ा सकूँ। मैं हर व्यक्ति के दिल में वर्षों तक राज करना चाहता हूँ। यदि मैं अपने प्रदेश के लोगों के लिए कुछ कर पाया तो खुद को धन्य समझूँगा।

Tuesday, 5 November 2013

जीवन में विज्ञान की उपयोगिता

 
जीवन में ''विज्ञान की उपयोगिता
 
सृष्टी में जीवों के प्रादुर्भाव काल से हम अपने वर्तमान काल तक को देखें तो ''विज्ञान किसी किसी रूप में हम से जुड़ा रहा है। हमारा जीवन ''विज्ञान के बगैर अधूरा है। हमारे विकास की एक-एक गाथा वैज्ञानिक सोच की ही देन है। इसने हमारे जीवन की कायाकल्प कर दी है।
 
प्रारंभिक मानव वनों में रहता था और कंद-मूल शिकार पर निर्भर था, अपितु उन्हें विज्ञान का आभास था। इसी वैज्ञानिक सोचवश उन्होंने अपने शिकार करने का ढंग, रहन-सहन और खान-पान में परिवर्तन लाया। आग का आविष्कार, शिकार के लिए पत्थरों की जगह धातुओं से बने हथियारों का प्रयोग, शिकार को पका कर खाने की पद्धति और अन्नोत्पादन की कलाएं आदि मानवीय वैज्ञानिक सोच का ही परिणाम है। आज के परिप्रेक्ष्य में आरंभिक मानव का दायरा संकीर्ण था, परन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इन प्रारंभिक खोजों ने ही मानवीय विकास की आधारशीला रखी।
 
विज्ञान में दिन--दिन अलौकिक प्रगति दृष्टिगोचर हो रही है। ऐसा मानव के वैज्ञानिक सोच के दायरे में निरंतर वृद्धि से ही संभव हो पाया है। हम अपने दैनिक कि्रयाकलापों में तथा प्रतिदिन अनेक वैज्ञानिक उपकरणों का प्रयोग करते हैं। अब चाहे वह गैस का स्टोवचूल्हा हो, या पंखा या मोटर बाइक, हर वस्तु जिस में मशीनीकरण किया गया है, अथवा मानव के सोच से परिवर्तित हो रहा है वह विज्ञान से जुड़ा है। विज्ञान के फलस्वरूप आज हमारे खान-पान, रहन-सहन और इलाज की पद्धति सरल हो गयी है।
 
जैसा कि हर विषय वस्तु का अच्छा और बुरा दोनों ही पहलू होता है, उसी प्रकार ''विज्ञान की अत्यन्त चहलकदमी से मानव को अनेक नुकसान भी हो रहा है। प्रकृति में मानव के अत्यन्त हस्तक्षेप ने मानव के असितत्व पर ही संकट ला खड़ा किया है। विश्व में अस्त्र-शस्त्रों की होड़ तथा निरंतर वैज्ञानिक खोजों से वातावरण सहित प्रकृति को अति क्षति का सामना करना पड़ा है। हम अनेक नए असाध्य रोगों के शिकार हो रहे हैं।
 इस प्रकार यह कहना न्यायोचित होगा कि विज्ञान का सीमित एवं हितकारी प्रयोग ही हमारे भविष्य के लिए उचित होगा। पर्यावरण में अत्यन्त हस्तक्षेप से ''विज्ञान भी हमारा भला नहीं कर पाएगा। इस पर एक प्रसिद्ध दोहा चरितार्थ होता है:- ''अब पछताए होत क्या जब चिडि़या चुग गर्इ खेत। अत: हमें यह प्रण करना चाहिए कि हम अपने जीवन में विज्ञान का उपयोग सीमित रूप में ही करेंगे। यह हमारे और हमारे भविष्य के लिए हितकारी होगा।